10. हिंदुओं और उनके मित्रों से कुछ प्रश्न - Page 47

30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यहां तक कि उदार भी हैं। राजनीतिक लाभ के लिए श्री राजगोपालचारी के राजनीतिक दावपेंच की याद अब तक ताजा है। वे अचानक मुस्लिम लीग के समर्थक बन गए हैं और उन्होंने अपने ही लोगों तथा पुराने मित्रों के साथ युद्ध की घोषणा क्यों कर दी है? मुसलमानों की न्यायसंगत मांगों के लिए नहीं_ बल्कि पाकिस्तान बनाने की बेतुकी मांग के लिए। अछूतों की मांग पर राजगोपालचारी क्या कहते हैं? जहां तक मैं समता हूं, उनके होठ सिले हुए हैं। उन्हें तो शायद यह तक पता नहीं कि इस देश में 6 करोड़ अछूत हैं। वे भी मुसलमानों की तरह अपने लिए राजनीतिक संरक्षण चाहते हैं। श्री राजगोपालचारी की यह सोची समझी चुप्पी और घोर उपेक्षा हिंदुओं की प्रवृति है। अछूतों की राजनीतिक मांगों का हिंदू एक पूरी हठधर्भिता और बदहवासी के साथ विरोध कर रहे हैं। प्रेस उनकी पिट्ठू है और वे अछूतों की मांग की उपेक्षा करने के सुनियोजित प्रयत्न करते हें। जब वे उनकी अवहेलना करने में विफल हो जाते हैं, तो उनके नेताओं को खरीद लेते हैं और जिस नेता के बारे में सोचते हैं कि उसे खरीदा नहीं जा सकता तो उसे गालियां बकने तक पर उतर आते हैं और उसके बारे में गलत अफवाहें फैलाते हैं। धौंसपट्टी देते हैं और जहां तक उनका वश चलता है, उसे दबाने और उसका मुंह बंद करने की कोशिश करते हैं। ऐसा नेता जो अछूतों के हितों के लिए जूझने को कटिबद्ध है, उसे और उसके अनुयायियों को गद्दार के रूप में पेश कर, उसकी निंदा की जाती है। अछूतों की राजनीतिक मांग से हिंदू इतने क्षुब्ध हो जाते हैं कि वे अपने क्रोध के कारण यह नहीं सोचते कि अछूत कितने उदार हैं कि वे जरा से राजनीतिक संरक्षण के बदले हिंदू बहुसंख्यकों का शासन स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। हिंदू इस बात से अवगत नहीं हैं कि संयुक्त आयरलैंड पर रेडमोंड और कारसन की बातचीत के दौरान रेडमोंड ने कारसन से क्या कहा था। यह घटना उल्लेखनीय के लिए भी संरक्षण मांगें, मैं उन्हे देने के लिए तैयार हूँ। कारसन का उत्तर बड़ा अक्खड़ और कठोर था जिसने विचार के लिए समय मांगे बिना कहा -- तुम्हारे संरक्षण भाड़ में जाए, मैं तुम्हारे अधीन नहीं रहना चाहता।’’ हिंदुओं को आभारी होना चाहिए कि अछूतों ने कारसन जैसा व्यवहार नहीं किया है। पर आभारी होने के बजाए वे अछूतों पर भिन्नाते हैं कि वे राजनीतिक संरक्षण मांग रहे हैं। हिंदुओं की नजर में अछूतों को अधिकार मांगने का कोई हक है। विभिन्न समुदायों की राजनीतिक मांगों पर हिंदुओं का भिन्न-भिन्न रवैया क्यों है? इससे तीन बातें प्रकट होती हैंः (1) वे सारे अधिकार स्वयं समेट लेना चाहते है? (2) वे अपनी राजनैतिक संस्थाओं को न्याय पर आधारित रखने को तैयार नहीं, (3) वे धौंस-पट्टी के आगे घुटने टेक देते हैं, परंतु न्याय की पुकार नहीं सुनते।

हिंदुओं की यह मनोवृत्ति भारतीय राजनीति का दुखद पक्ष है। भारतीय राजनीति