हिन्दुओं और उनके मित्रों से कुछ प्रश्न 31
में अस्पृश्यता ही अकेला दुखद पक्ष नहीं है। इतना ही दुखद पक्ष एक और भी है। वह है विदेशों में हिंदुओं के दोस्त। हिंदुओं ने प्रचार की चालबाजी से दुनिया भर में
खास तौर से स्वतंत्रता की भूमि अमरीका में बहुत से मित्र पैदा कर लिए हैं। दुखद बात यह है कि हिंदुओं के ये दोस्त यह सोचे बिना हिंदुओं का समर्थन कर रहे हैं कि क्या वह वही पक्ष है जिसका समर्थन करना न्याय का तकाजा है। जहां तक मैं समझता हूं, हिंदुओं के किसी अमरीकी मित्र ने अभी तक यह नहीं पूछा है कि हिंदू चाहते क्या हैं? वे स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं या सत्ता के लिए? यदि हिंदू सत्ता के लिए लड़ रहे हैं, तो क्या अमरीकी दोस्तों का हिंदुओं की सहायता करना न्यायसंगत है? यदि हिंदू स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो क्या उनसे अपना लक्ष्य घोषित करने के लए नहीं कहा जाना चाहिए? अमरीकी कम से कम इतना तो कर सकते हैं। यदि अमरीकी मित्र हिंदुओं के आह्वान पर सक्रिय होना ठीक मानते हैं, तो अमरीकियों को यह बताना आवश्यक है कि स्वतंत्रता के लिए हिंदुओं के पक्ष में बिना सोचे समझे अंधाधुंध समर्थन करने में वे क्या गलती कर रहे हैं। मेरा कहना वही हैं जो स्वयं हिंदुओं ने कहा है। जब युद्ध शुरू हुआ था, तो कांग्रेसी और कांगे्रस से बाहर के हिंदुओं ने मांग की थी कि ब्रिटेन को युद्ध में अपने लक्ष्यों को घोषित करना चाहिए। प्रति दिन अंग्रेजों से कहा गया ‘‘यदि आप हमारी सहायता चाहते हैं, तो हमें यह बताओं कि आप किसलिए लड़ रहे हैं? यदि आप स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं, तो हम बताओं कि क्या आप हमें भी स्वतंत्रता देंगे जिसके लिए आप यह युद्ध लड़ रहे हैं। एक समय था, जब हिंदू ब्रिटेन के इस आश्वासन पर संतुष्ट हो जाने को तैयार थे कि भारत का उस स्वतंत्रता युद्ध से लाभ होगा, जो वे लड़ रहे हैं। उन्होंने एक कदम आगे बढ़ाया हैं। अब वे मात्र अंग्रेजों के वायदे से ही संतुष्ट नहीं हैं। या इसे कांग्रेस के शब्दों में ही कहें ‘‘वे इस बैंक के पेशगी चेक लेने के लिए तैयार नहीं हैं, जो डूब रहा है।’’ वे चाहते हैं युद्ध के लिए भारतीयों को स्वैच्छिक समर्थन से पूर्व ही तुरंत स्वतंत्रता दे दी जाए। श्री गांधी का नया नारा ‘‘भारत छोड़ो’’ महत्वपूर्ण है। श्री चर्चिल इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्होंने जवाब दिया है कि युद्ध का उद्देश्य शत्रु पर विजय पाना है। हिंदु इससे संतुष्ट नहीं है। उन्होंने उनसे फिर पूछा -- ‘‘जब आप विजय प्राप्त कर लेंगे, तो आप क्या करेंगें? युद्ध के बाद आपकी सामाजिक व्यवस्था क्या होगी?’’ जब श्री चर्चिल ने उत्तर दिया कि आशा के अनुसार युद्ध के बाद परंपरागत ब्रिटेन को बहाल किया जाएगा, तो इस उत्तर से तूफान उठ खड़ा हुआ। मैं इस बात से सहमत हूं कि ये जायज सवाल थे। परंतु हिंदुओं के दोस्त ऐसा नहीं सोचते कि श्री चर्चिल से यदि ऐसा सवाल पूछा जाना जायज है, तो क्या श्री गांधी और हिंदुओं से वही सवाल पूछा जाना जायज