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हिन्दुओं और उनके मित्रों से कुछ प्रश्न 33

उनके सरंक्षण और खुशहाली का मार्ग प्रशस्त हो सकें।’’

परन्तु वे यहीं विराम लगा देते हैं। वे उस घोषणा के पूर्व अंश की परवाह नहीं करते जिसमें कहा गया है -

‘‘हम समझते हैं कि यह तथ्य स्वयंसिद्ध है कि सभी मनुष्य समान बनाये गये

हैं, नियंता ने उन्हें अविच्छिन्न अधिकार प्रदान किए हैं वे हैं, जीवन, स्वतंत्रता

और प्रसन्नता का मार्ग। इन अधिकारों की प्राप्ति हेतु सरकार का गठन होता है

जो प्रजा से न्यायसंगत अधिकार प्राप्त करती है।’’

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस घोषणा-पत्र को लागू करने से अमरीकी इतिहास में एक दुखद घटना घटी है। इस दस्तावेज के बारे में दो विचारधाराएं हैं। कुछ समझते हैं कि यह महान आध्यात्मिक अभिलेख है। दूसरों का कहना है है कि इसने कई असतयों को शाश्वत बना दिया है। मानवीय स्वाधीनता का सिद्धांत किसी तरह नीग्रो जन पर लागू नहीं किया गया है। फिर भी यह महत्त्वपूर्ण बात है कि घोषणा-पत्र में उसे शामिल तो किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है और निश्चित रूप से इस घोषणा-पत्र के लेखक जेफरसन की आस्था पर भी संदेह नहीं किया जा सकता। वे इस बात को कभी नहीं भूल सके कि एक लम्बे सिद्धांत की घोषणा के बाद उसके पालन पर उनके देश ने कन्नी काट ली। उन्होंने लिखा हैः मुझे अपने देशवासियों के बारे में अफसोस है।’’ नीग्रो जन को इससे सुकुन नहीं मिलता। परंतु यह भी कम संतोष की बात नहीं है कि देश की आत्मा बिल्कुल निर्जीव नहीं हुई है और धार्मिक हीनता की भावना एक दिन मिट जाएगी। नीग्रो इसका मखौल उड़ा सकते हैं। परंतु सच्चाई यह है कि अछूत हिंदुओं से इतनी सी बात की उपेक्षा भी नहीं कर सकते। लोगों को आज इस बात पर गर्व है कि हिंदु एक संगठित समाज है। परंतु भारत के अछूतों को इस बात पर आश्चर्य होता है। यह सुकून के बजाए दर्द है -- क्योंकि नीग्रो लोगों के लिए अमरीका में पूरा दक्षिण एकजूट है। क्या हिंदुओं में कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है, जिसमें लज्जा और ग्लानि की ऐसी भावना मौजूद हो जैसी जेफरसन में थी? मैं सोच सकता हूं कि दुनिया के सामने अपनी आजादी की मांग पेश करने से पहले हिंदू अपने ऊपर लगे अस्पृश्यता के कंलंक से शर्मिंदा होते है। वे आजादी की दुहाई देते हैं -- अफसोस है उन्हें समर्थन मिलता है -- यह इस बात का सबूत है कि उनकी आत्मा मर चुकी है कि वे धार्मिक अनादर का अहसास नहीं करते और उनकी दृष्टि में अस्पृश्यता न तो नैतिक पाप है और न ही सामाजिक अपराध। उनके लिए बस यह क्रिकेट या हाकी का खेल है। श्री गांधी के मित्र निस्संदेह उनसे उनके कार्यों के विषय में पूछेंगे। परंतु श्री गांधी ने हिंदू समाज में सुधार के लिए क्या किया है कि उनके कृतित्व ओर व्यक्तित्व में लोकतांत्रिक लोगों को आशा और आश्वासन