34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की झलक दिखाई दे? उनके मित्रों को हरिजन सेवक संघ का हवाला दिया जाता है और वे पूछते हैं कि क्या ‘‘हरिजन सेवक संघ हरिजन उत्थान का कार्य नहीं कर रहा?’’ क्या ऐसा है। हरिजन सेवक संघ का उद्देश्य क्या है? क्या यह अछूतों को इसके लिए तैयार करता है कि वे हिंदू स्वामियों से मुक्ति पाएं और उन्हें सामाजिक और राजनीतिक समानता प्राप्त हो? श्री गांधी के सामने कभी ऐसा लक्ष्य नहीं था, और वे कभी ऐसा करना नहीं चाहते। मैं कहता हूं कि वे ऐसा नहीं कर सकते। यह काम तो लोकतंत्रवादी और क्रान्तिकारी का है। गांधी दोनों में से कुछ नहीं हैं। वे जन्म से भी और विश्वास से भी अनुदारवादी हैं। हरिजन सेवक संघ का कार्य अछूतों का उत्थान नहीं है। जैसा कि प्रत्येक स्वाभिमानी अछूत जानता है, उनका मुख्य उद्देश्य भारत को हिंदुओं और हिंदुत्व के लिए सुरक्षित रखना है। वे अछूतों की लड़ाई निश्चित रूप से नहीं लड़ रहे। इसके विपरीत हरिजन सेवक संघ के माध्यम से शुद्र अछूतों को शुद्र उपहार बांट कर उन्हें खरीद रहे हैं। उन्हें नाकारा बना रहे हैं। अछूतों के विरोध को अशक्त कर रहे हैं जिसके विषय में वे जानते हैं कि वे जाति प्रथा को पंगु बना देंगे और भारत में वास्तविक लोकतंत्र स्थापित करेंगे। श्री गांधी हिंदुत्व और हिंदुओं को जीवंत रखना चाहते हैं। श्री गांधी अछूतों को हिंदू ही रखना चाहते हैं। पर कैसा? एक सहचर के रूप में नहीं पद-दलितों के रूप में। श्री गांधी अछूतों के प्रति दयालु नहीं हैं, बल्कि प्यार के भुलावों में वे उन्हें और हिंदुओं से अलग तथा स्वतंत्र रहने के उनके आंदोलन को मटियामेट करना चाहते हैं।
हरिजन सेवक संघ उनके उन हथकंड़ों में से एक है, जिससे उनका प्रपंच चल रहा है।
अब श्री जवाहरलाल नेहरु पर आते हैं। वे जेफरसन के घोषणा-पत्र से प्रेरित हैं। परंतु क्या उन्होंने कभी 6 करोड़ अछूतों की स्थिति पर लज्जा अथवा पश्चाताप प्रकट किया? क्या उन्होंने अपने साहित्य में उस पर प्रकाश डाला है? आप चाहे तो भारत के युवाओं को देखिए। विश्वविद्यालयों से भरे छात्र जो पंडित नेहरु का अनुसरण करते हैं, वे सदा अंग्रेजों के विरूद्ध संग्राम में शामिल होने के लिए तैयार रहते हैं। परन्तु ऊंचे हिंदू घरानों के इन बच्चों ने अपने पूर्वजों के अछूतों के साथ किए गए दुर्व्यवहार को समाप्त करने के लिए क्या किया है? सैंकड़ों हिंदू युवक राजनीतिक प्रोपेगंडा में शामिल होने के लिए मिल जायेंगे, परन्तु एक भी ऐसा युवक नहीं मिल सकता, जिसने जाति प्रथा तोड़ने या अस्पृश्यता मिटाने का बीड़ा उठाया हो। हिंदू-मानस के लिए लोकतांत्रिक सिद्धांत जीवित रहते हैं। ऐसे अनुदार हाथों में लोकतंत्र और स्वतंत्रता सौंपना सबसे बड़ी गलती होगी, जो लोकतंत्रवादी कर सकते हैं। हिंदुओं के अमरीकी दोस्तों के लिए श्री गांधी और हिंदुओं से कहना चाहिए कि वे अपने संघर्ष