नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 60

परिशिष्ट 43

यह प्रक्रिया जारी है, परंतु अधिकांश देशों में व्यस्क मताधिकार तथा बार-बार चुनाव से अधिक कुछ करना आवश्यक नहीं समझा गया, जिससे जनता द्वारा जनता की और जनता के लिए सरकार का सिद्धांत मान लिया गया है।

मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि ये दोनों धारणाएं मिथ्या और भ्रामक हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी देश की स्वतंत्रता और उस देश के लोगों की भी स्वतंत्रता के बीच भेद नहीं कर पाता तो वह यदि धोखा नहीं खा जाता है तो भ्रमित अवश्य हो जाता है, क्योंकि समाज, राष्ट्र और देश ऐसी शब्दावलियां हैं, जो भिन्नार्थक नहीं है, तो अनिश्चित अर्थो वाली हैं। यह कहना आवश्यक है कि राष्ट्र एक शब्द है जिसका अर्थ है कई श्रेणियां। दर्शनशास्त्र के अनुसार राष्ट्र को ईकाई माना जा सकता है परंतु समाजशास्त्र की दृष्टि से इसका अर्थ यही है कि वह अनेक श्रेणियों का समूह नहीं हो सकता और किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता का यथार्थ अर्थ यही हो सकता है कि वास्तविक स्वतंत्रता उसमें समाहित विभिन्न श्रेणियों की स्वतंत्रता और विशेष रूप से दास वर्ग की स्वतंत्रता से प्राप्त होती है।

किसी देश में संवैधानिक पद्धति की सरकार को बनाए रखने के लिए संवैधानिक नैतिकता आवश्यक होनी चाहिए। परंतु संवैधानिक सरकार का चलना लोगों द्वारा चुनी गई स्वासी सरकार के समान ही नहीं होता। साथ ही यह भी माना जा सकता है कि व्यस्क मताधिकार से बनी सरकार कहने को तो राजतंत्र से भिन्न लोगों की सरकार हो सकती है, परन्तु इसी से यह लोकतांत्रिक सरकार नहीं हो पाती जिससे इसे लोगों द्वारा और लोगों के लिए सरकार कहा जा सके।

जिसे पश्चिमी यूरोप की संसदीय लोकतंत्र की त्रासदी का पता है उसे लोकतंत्र के दिवा स्वप्नों के और साक्ष्य देने की आवश्यकता नहीं होगी।ऽ मैंने पहले भी एक स्थान पर जो कहा था उसके अनुसार पश्चिमी यूरोप में लोकतंत्र की विफलता का कारण निम्नांकित शब्दों में निरूपित किया जा सकता हैः-

‘‘मानव समाज में सरकारों में बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। एक समय था,

जब सरकार स्वेच्छाचारी सम्राटों का निरंकुश स्वरूप हुआ करती थी। फिर लंबे

समय तक हुए रक्तपात के बाद सरकार की नई पद्धति आई जो संसदीय लोकतंत्र

कहलाया। तब यह समझा गया कि सरकार के स्वरूप की यह चरम परिणति

है। तब यह समझा गया कि सरकार के स्वरूप की यह चरम परिणति है। तब

यह विश्वास था कि इससे एक स्वर्ण युग आ जाएगा, जिसमें प्रत्येक मानव

ऽ 17 सितंबर 1943 को नई दिल्ली में आल इंडिया ट्रैड यूनियन वर्कर्स स्टडी कैंप में पढ़ा गया प्रबंध

लेख - लेबर एंड पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी।