44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को समानता, संपत्ति और खुशहाली की स्वतंत्रता मिलेगी। ऐसी उच्चाकांक्षाओं का अच्छा आधार था। संसदीय लोकतंत्र में जनता की अभिव्यक्ति के लिए विधायिका होती है। विधायिका के अधीन कार्यपालिका होती है। और दोनों पर नियंत्रण रखने तथा निर्धारित सीमाओं में रखने के लिए न्यायपालिका होती है। संसदीय लोकतंत्र में लोकप्रियता के सभी लक्षण होते हैं अर्थात लोगों की लोगों द्वारा लोगों के लिए सरकार। परंतु यह आश्चर्य की बात है कि संसदीय लोकतंत्र के विरूद्ध भी विद्रोह हुए हालांकि एक सौ साल भी नहीं हुए हैं जब इसका उदय हुआ और इसे पूरे विश्व में स्वीकार और अंगीकार कर लिया गया। अब इसके विरूद्ध इटली, जर्मनी, रूस और स्पेन में विद्रोह हुए। कुछ ही ऐसे देश हैं जहां संसदीय लोकतंत्र के विरूद्ध असंतोष नहीं है। संसदीय लोकतंत्र के विरूद्ध अंसतोष क्यों पनपा? यह एक विचारणीय प्रश्न है। ऐसा कोई अन्य देश नहीं है जहां इस प्रश्न पर भारत के समान तत्परता से विचार किया जाना चाहिए। भारत में संसदीय लोकतंत्र की बात चल रही है। यहां किसी ऐसे साहसी व्यक्ति की अत्यंत आवश्यकता है, जो भारतीयों को बता सके, ‘‘संसदीय लोकतंत्र से सावधान रहो। यह इतनी श्रेष्ठ व्यवस्था नहीं है, जैसी दिखाई देती है।’’
संसदीय लोकतंत्र क्यों विफल हुआ? तानाशाहों के देशों में यह इसलिए विफल हुआ कि इसकी गति बहुत धीमी है। इसमें सहज क्रिया का विलंब होता है। किसी संसदीय लोकतंत्र में विधायिका द्वारा कार्यपालिका के कार्यों में बाधा डाली जा सकती है, जो कार्यपालिका द्वारा प्रस्तावित कानूनों को पास करने से इंकार कर सकती है और यदि विधायिका द्वारा बाधा न डाली जाए, तो न्यायपालिका बाधा डाल सकती है, जो कानून को अवैध घोषित कर सकती है। संसदीय लोकतंत्र में तानाशाही की छूट नहीं होती। इसीलिए इटली, स्पेन और जर्मनी में इसकी साख जाती रही। इन देशों में तानाशाही का स्वागत किया। यदि अकेले तानाशाह ही संसदीय लोकतंत्र के विरूद्ध होते तो कोई बात नहीं थी। संसदीय लोकतंत्र के विरूद्ध घोषणा का स्वागत इस कारण किया जाएगा, क्योंकि यह तानाशाही पर लगाम का काम करेगी। परंतु दुर्भाग्य से उन देशों तक में संसदीय लोकतंत्र के विरूद्ध काफी अंसतोष है जहां के लोग तानाशाही के विरूद्ध हैं। संसदीय लोकतंत्र के विषय में यह अत्यधिक खेदजनक है। यह बहुत ही खेदजनक है क्योंकि संसदीय लोकतंत्र एक बिंदु पर टिका नहीं रहा। यह तीन दिशाओं में बढ़ा। समान मताधिकार के रूप में यह राजनीतिक अधिकारों में समानता लाया। बहुत कम ऐसे देश हैं, जहां संसदीय लोकतंत्र है और व्यस्क मताधिकार नहीं है। उसने सामाजिक समता और आर्थिक अवसरों को राजनीतिक