46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने का इसमें प्रयत्न ही नहीं किया जाता।
परिणाम यह निकलता है कि स्वतंत्रता समानता को निगल जाती है और लोकतंत्र
एक मजाक बन कर रह जाता है।
मैंने कुछ गलत विचारधाराओं का जिक्र किया है, जो मेरे विचार से
संसदीय लोकतंत्र की विफलता का कारण हैं। परंतु मुझे यह भी विश्वास है
कि गलत विचारधारा की अपेक्षा गलत संगठन संसदीय लोकतंत्र की विफलता
के लिए अधिक जिम्मेदार है। सारे राजनीतिक संगठन दो वर्गों में बंट जाते हैं
- शासक और शासित। यह दुर्भाग्य है। यदि इतना ही दोष होता तो भी अधिक
बुराई नहीं थी। परंतु विभाजन का दुखद पक्ष यह है कि विभाजन एक ढर्रा और
नियति बन जाती हे कि शासक जातियां सदा शासक ही बनी रहती हैं और
शासित जातियां कभी शासक नहीं बन सकतीं। यह इसलिए होता है कि लोग
यह परवाह ही नहीं करते कि वे अपना शासन आप चलाएं। वे इसी बात से
संतुष्ट हो जाते हैं कि एक सरकार बना दें और वह उन पर राज करती रहे।
इससे स्पष्ट होता है कि संसदीय लोकतंत्र कभी लोगों की सरकार या लोगों
द्वारा बनाई गई सरकार नहीं रही और वास्तव में यह वंशानुगत प्रजा और वंशानुगत
शासकों की सरकार रही है। राजनीति का यह वह विषैला संगठन है, जिसने
संसदीय लोकतंत्र को दयनीय रूप से विफल कर दिया है। यही कारण है कि
संसदीय लोकतंत्र जनसामान्य की आकांक्षाएं पूरी नहीं कर सका और उन्हें
स्वतंत्रता, संपत्ति और प्रसन्नता नहीं दे सका।’’
यदि लोकतंत्र की विफलता के कारणों का यह विश्लेषण सही है तो लोकतंत्र के हिमायतियों के लिए यह एक चुनौती है। कुछ मूलभूत बातें हैं, जो लोकतंत्र की जड़ें हैं, जिसकी वे अनदेखी नहीं कर सकते। बात को और स्पष्ट करने के लिए यह बातें क्रमवार रखनी होंगी।
पहले तो हमें यह ऐतिहासिक सत्य स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रत्येक देश में दो वर्ग होते हैं - शासक और दास वर्ग, जिनके बीच बराबर सत्ता संघर्ष रहता है। दूसरी बात यह है कि सत्ता और प्रतिष्ठा के बल पर शासित वर्ग पर अपना प्रभुत्व जमाना उनके लिए आसान काम है। तीसरी बात यह है कि वयस्क मताधिकार और चुनावों की प्रवृति के बावजूद शासक वर्ग के सामने सत्ता प्राप्त करने में कोई अवरोध नहीं आता। चौथी बात यह है कि शासित वर्ग के लोग अपनी हीन भावना के कारण शासक वर्ग को अपना स्वाभाविक नेता मानते हैं और दास वर्ग उन्हें स्वेच्छा से शासक चुन लेता है। पांच बात यह है कि लोकतंत्र में स्वायत्त शासन में आस्था न रखने वाले शासक वर्ग की मौजदूगी के कारण और इस तथ्य के संदर्भ में कि जहां