परिशिष्ट 47
तक शासक वर्ग सत्ता की डोर को थामे रहता है, वहां यह सोचना ही गलत है कि लोकतंत्र और स्वशासन समाज का वास्तव में अंग बन गए हैं। छठी बात यह है कि लोकतंत्र और स्वशासन तभी यथार्थ रूप ग्रहण नहीं कर सकते हैं जब वयस्क मताधिकार लागू हो जाए बल्कि ये तभी साकार बन सकते हैं जब शासक वर्ग की वह क्षमताएं ही समाप्त हो जाएं जिनके बल पर वह सत्ता प्राप्त करता है। सातवां तथ्य है कुछ देशों में शासित वर्ग शासक वर्ग को वयस्क मताधिकार से सत्ताच्युत करने में सफल हो जाता है। कुछ दूसरे देशों में शासक वर्ग की जड़े इतनी गहरी होती हैं कि शासित वर्ग को इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वयस्क मताधिकार के साथ कुछ अन्य संरक्षणों की भी आवश्यकता होती है।
चूंकि इन विचारों का प्रतिपादन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए हर स्वतंत्राप्रेमी के सामने उन्हें प्रमुखता से रखना आवश्यक है, ताकि वह इनको देख सके और समझ सके। इनसे उसे इतनी सहायता मिलेगी जितनी किसी अन्य बात से नहीं मिल सकती। इसी से उसे अहसास होगा कि लोकतंत्र के लिए संविधान की रचना के समय वह याद रखे कि ऐसे संविधान का मुख्य उद्देश्य शासक जातियों को सत्ता का स्थाई भोगी न बनने देना है जिससे कि लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना की प्रक्रिया हठधर्मिता बन कर रह जाए। शासक जातियों को सत्ता से बाहर रखना मुख्य उद्देश्य है। लोकतांत्रिक सरकार की प्रक्रिया स्थापना की समरूप न रहे कि लोकतंत्र की प्रक्रिया को न केवल सहन किया जाए बल्कि उसे स्वीकार किया जाए क्योंकि वह प्रक्रिया ही है, जिसके बल पर शासक वर्ग शासित वर्ग पर सर्वत्र अपना वर्चस्व बनाए रखता है।
यही लोकतंत्र है, परंतु राजनीति पर जिन पश्चिमी लेखकों से विदेशी प्रभावित होते हैं, वे राजनीति के इस यथार्थ रूप को समझने में असफल रहे हैं। इसके बजाए वे इसके सैद्धांतिक या किताबी तथा ऊपरी बातों से ही प्रभावित हैं, जो संवैधानिक नैतिकता, वयस्क मताधिकार तथा चुनावों की आवृति को ही सब कुछ समझते हैं।
जो इस विचार को मानते हैं कि लोकतंत्र इन तीनों बातों को छोड़ कर और कुछ नहीं है या वह इनसे भिन्न नहीं है वे शासक वर्ग के ही विचारों को प्रकट करते हैं। शासक वर्ग अनुभवों से जानता हैं कि इस प्रकार की व्यवस्था इनकी सत्ता और स्थिति के लिए घातक साबित नहीं हुई है। दरसल उन्होंने अपने अधिकारों और प्रतिष्ठा को कानूनी गुणों का लबादा ओढ़ा लिया है और शासित वर्ग के प्रहार के सामने अपनी निर्बलता का असर कम कर दिया है।
जो यह चाहते हैं कि लोकतंत्र और स्वशासन स्वतः स्वाभाविक रूप से प्राप्त हों और वे केवल सैद्धांतिक न हों तो उनके लिए बेहतर यह है कि वे इस बात को