नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 65

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भली भांति समझ लें कि स्थायी शासक वर्ग की मौजूदगी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। लोकतंत्र को अपनाने के लिए ऐसी ही नीति अपनानी होगी। कोई निष्कर्ष निकालने से पूर्व उन वर्गो की मौजूदगी को भुला देना एक घातक भूल होगी और देखना होगा कि क्या किसी स्वतंत्र देश में स्वतंत्रता किसी विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के ही हिस्से में आएगी अथवा वह सभी को नसीब होगी। मेरे विचार से जो विदेशी कांग्रेस का पक्ष लेना पसंद करते हैं, उन्हें यह नहीं पूछना चाहिए कि क्या कांग्रेस स्वतंत्रता के लिए लड़ रही है? उसे पूछना चाहिए कि कांग्रेस किस स्वतंत्रता के लिए लड़ रही है? क्या वह भारत की शासक जातियों के लिए लड़ रही है या भारत की जनता के लिए लड़ रही है ? यदि उसे पता चलता है कि कांग्रेस शासक जातियों के लिए लड़ रही है तो उसे कांग्रेस से पूछना चाहिए कि क्या भारत की शासक जातियां राज करने के लिए उपयुक्त पात्र हैं? कांग्रेस का पक्ष लेने से पूर्व उसे कम से कम इतना तो करना ही चाहिए।

इन प्रश्नों का कांग्रेस क्या उत्तर देगी? मुझे पता नहीं है। परंतु मैं इन सवालों का सही उत्तर दे सकता हूँ।

IV

मैं नहीं कह सकता कि इस अधयाय के तीसरे भाग में जो लिखा गया है उससे विदेशी प्रभावित होंगे अथवा नहीं। यदि वह उससे प्रभावित होते हैं तो वे निस्संदेह इस बात के सबूत मांगेगे कि कांग्रेस देश की आजादी की लड़ाई लड़ कर देश में लोकतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष नहीं कर रही हैं, बल्कि प्राचीन हिंदू राजनीति की पुनर्स्थापना की तैयारी कर रही है, जिससे वंशानुगत शासक जातियां शासित वर्ग पर राज कर सकें। मुझे यह पता नहीं कि विदेशी साक्ष्य से संतुष्ट होंगे या नहीं । परन्तु मैं इसे उनके समक्ष रखने के लिए तैयार हूं ।

भारत में शासक जातियां कौन हैं? भारतीयों के लिए यह प्रश्न आवश्यक नहीं है, परंतु विदेशियों के लिए प्राथमिक और अनिवार्य है। इसलिए इस पर विचार किया जाना चाहिए। भारत में शासक जातियां मुख्यतया ब्राह्मण हैं। आश्चर्य की बात है कि आज के ब्राह्मण इस कथन का खंडन करते है कि वे शासक जातियों से संबंधित हैं यद्यपि वे किसी समय अपने को भूदेव कहते थे। उन्होंने यह पलटी क्यों खाई? प्रत्येक समुदाय में बौद्धिक वर्ग को उसकी आचार संहिता द्वारा एक पावन कर्तव्य सौंपा जाता है, अर्थात् समुदाय का हित रक्षण। यह नहीं कि अपने हितों के लिए वे उसी कर्तव्य की बलि चढ़ा दें। संसार में किसी आध्यात्मिक वर्ग ने इतना विश्वासघात नहीं किया जितना भारत में ब्राह्मणों ने किया है। यह सोचना होगा कि उन्होंने अपराधबोध से तो