नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 78

परिशिष्ट 61

केवल पंडित ही ब्राह्मण होने की भावना से ओतप्रोत हैं। ऐसा कहा जाता है कि दिसंबर 1940 में दिल्ली में आल इंडिया वूमन्स कांफ्रेंस हुई थी, उसमें जनगणना में जाति घोषणा न करने के विषय में वार्तालाप हुआ था। श्री पंडित ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया था और कहा था कि उन्हे ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता, जिससे वह अपने को ब्राह्मण रक्त होने पर गर्व न करें। उन्होंने अपने को ब्राह्मण ही लिखाया था। ये लोग कौन है? उनकी हैसियत क्या है? श्री तिलक स्वराज्य आंदोलन के जनक कहलाते है। श्री पटेल और पंडित नेहरू का स्थान कांग्रेस में श्री गांधी के एकदम बाद आता है।

ऐसा समझा जाता है कि कांग्रेस हाई कमान के सदस्यों के विचार व्यक्तिगत तथा निजी हो सकते है। परन्तु ऐसा सोचना गलत होगा। ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता है, जब कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान में ऐसी बातों का अमल किया गया।

1919 में जब से श्री गांधी ने कांग्रेस पर कब्जा जमाया, ब्रिटिश सरकार से स्वराज्य की मांग मनवाने के लिए कांग्रेसियों ने विधान सभाओं का बहिष्कार करना अपना उददेश्य बना लिया। इस नीति के अंतर्गत उन्होने न केवल चुनाव प्रचार से हाथ खींच लिया वरन् चुनावों में कांग्रेस ने कांग्रेस टिकट पर उम्मीदवार लड़ाने के विरोध में प्रचार किया, और यह भी कहा कि कोई हिन्दू निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भी खडा नहीं होगा। ऐसी नीति के गुणावगुण पर विवाद की आवश्यकता नहीं। परन्तु चुनाव में स्वतंत्र टिकट पर हिंदुओं को खड़े होने से रोकने के लिए कांग्रेस के रवैये का क्या अर्थ था? जो तरीके अपनाए गए थे, उनका लक्ष्य था विधान सभाओं को अपमान का निशाना बनाना। तदनुसार कांग्रेस ने विभिन्न प्रांतों में इस बात का प्रचार करने के लिए जलूस निकाले, जिनमें तख्तियों पर लिखा था फ्विधान सभाओं में कौन जाएंगे । केवल नाई, मोची, कुम्हार और झाडू लगाने वाले भंगी।य् जलूस में नारे का प्रश्नवाचक भाग एक आदमी बोलता था कि विधानसभाओं में कौन जाएंगे, और भीड़ की ओर से उत्तर दिया जाता था, नाई। जब कांग्रेसियों ने देखा कि चुनावों में खडे होने से इस प्रकार डरा कर रोकने का उपाय कारगर नहीं सिद्ध हो रहा है तो उन्होंने इस से अधिक कठोर कदम उठाए। कांग्रेसियों ने यह माहौल बनाया कि कोई भी इज्जतदार उम्मीदवाद चुनाव में खड़े होने से कतराएगा, यदि उन्हे निश्चय हो जाए कि विधान सभाओं में उन्हें नाइयों, कुम्हारों और भंगियों के साथ बैठना पडेगा-इसी विश्वास पर कांग्रेसियों ने वैसे ही शूद्र समुदायों से संबंधित उम्मीदवारों को चुनाव में कांग्रेस टिकट से खड़ा किया और उन्हें निर्वाचित कराया। कांग्रेस की ऐसी निर्लज्ज करतूतों के कुछ उदाहरण दिए जा सकते है। वर्ष 1920 में चुनाव में