नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 81

64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किसी अन्य की नहीं? क्या इसमें संदेह है कि कांग्रेस शासक जातियां है और शासक जातियां ही कांग्रेस हैं? क्या इसमें कुछ संदेह बचा है कि जब 1937 में स्वराज्य प्रांतीय विधानमंडलों के रूप में आया तो कांग्रेस ने इरादतन और निर्लज्जता से शासक जातियों को सत्तासीन कर दिया?

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उपरोक्त तथ्यों से निस्सदेंह सिद्ध होता है कि कांग्रेस द्वारा शुरू किया गया स्वतंत्रता-संग्राम भारतीय स्वतंत्रता के लक्ष्य और उददेश्य से भटका हुआ है और इस भटकाव में कांग्रेस का हाथ है। इसके परिणाम बहुकोणीय हैं। जो भारत की शासक जातियों के दृष्टिकोण और सामाजिक दर्शन को न जानता हो उसके लिए इसके फलितार्थ को समझना संभव नहीं है।

पहले ब्राह्मणो को लीजिए । इतिहास के अनुसार वे भारत की शासक जातियों में सब से अधिक शक्तिशाली और अधिकार संपन्न हैं। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि वे शासित वर्ग के घोर शत्रु हैं।

शुद्र और अछूत हिन्दुओं की आबादी 80 या 90 प्रतिशत हैं। ब्राह्मण उनके घोर शत्रु रहे हैं। दीन-हीन शासित जातियां नीचे गिरी हुई है, अपमानित है, निराश हैं और कुंठित हैं। वह केवल ब्राह्मणों के कारण और उनके दर्शन के कारण ही हुआ है। इस ब्राह्मणवाद के दर्शनशास्त्र के 6 धर्म सूत्र हैंः (1) विभिन्न वर्गो में असमानता (2) शुद्रों और अछूतों की पूरी बेवसी (3) शूद्रों और अछूतों के लिए शिक्षा द्वार बंद होना (4)सत्ता और अधिकार से शुद्रों और अछूतों को पूर्णतः वंचित रखना (5) शुद्रों और अछूतों को संपत्ति संचय से वंचित रखना और (6) स्त्रियों की पूर्ण अधीनता एवं दमन। असमानता ब्राह्मणवाद का आधिकारी सिद्धांत है और दलितों द्वारा समानता के लिए प्रयास करने के कारण उनके दमन करने पर उसे पश्चाताप नहीं होता, बल्कि यह उसका परम कर्तव्य है। कुछ देश ऐसे है, जहां कुछ लोगो के सिवाय अन्य लोगो को शिक्षा नहीं मिल पाती। परन्तु भारत की एक ऐसा देश है जहां प्रबुद्ध वर्ग, जैसे कि ब्राह्मणों ने शिक्षा पर एकाधिकार ही नहीं कर रखा, बल्की निम्न वर्गो के लिए शिक्षा ग्रहण करना अपराध मान कर जीभ काट लेने की सजा अथवा अपराधी के कान में पिघला हुआ सीसा डालने की व्यवस्था है। इसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने सदियों तक शासित जातियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा। आज भी ब्राह्मण उनकी शिक्षा का उतना ही विरोधी है जितना 1891 में जनगणना-आयुक्त श्री बेन्स ने लिखा हैः-

फ्शिक्षा के विस्तार में दूसरा प्रतिरोधी प्रभाव देश में प्राचीनकाल से विद्यमान