परिशिष्ट 65
एक ऐसे परंमपरागत वर्ग की मौजूदगी है जिसका मुख्य उददेश्य पूरे ज्ञान
विज्ञान पर अपना एकाधिकार जमाए रखना है ताकि वे अपनी सामाजिक
श्रेष्ठता को कायम रख सके। यह पंडा-पुरोहित वर्ग जानता है कि केवल
अशिक्षितों पर राज कर सकते हैं। लेखन-कार्य करने वाली जातियों के
विकास पर ब्राह्मणों का विरोध पहले ही वर्णित किया जा चुका है और
जनसाधारण में शिक्षा के प्रसार को लेकर आजकल दोनों के बीच चल
रहा मनमुटाव लंबे अनुभव के पश्चात ही प्रकट हो सकेगा। यह ठीक है
कि ब्रिटिश सरकार को प्राथमिक शिक्षा के लाभ और आवश्यकता के
अहसास की कुछ प्रतिक्रिया शिक्षित जातियों में हुई हैं, परंतु अभी उस
पर सैद्धांतिक सहमति ही हुई है। मौजूदा हालात में इसकी सहज ही में
अनदेखी नहीं कि जा सकती। यह स्वागत योग्य भी है कि इनमें से कई
जातियों को जीवनयापन के अवसर मिलते हैं, क्योकि उन्हें अध्यात्मिक
शिक्षा तक ही केंद्रित रहती है, जिसका लाभ उठाने की स्थिति में वे
हैं।
कांग्रसी राजनीतिज्ञ शिकायत करते हैं कि अंग्रेज भारतीय जनता को पूर्णतया शक्तिहीन करके शासन चला रहे हैं। परन्तु वे भूल जाते हैं कि शुद्रो और अछूतों को शक्तिहीन करने का कानून ब्राह्मणों द्वारा लागू किया गया था। वास्तव में शूद्रों और अछूतों को शक्तिहीन रखने में ब्राह्मण अटल विश्वास रखते हैं। जब ब्राह्मणों को शस्त्र धारण करने की आवश्यकता हुई तो अपनी सुख-सुविधाओं की सुरक्षा के लिए उसने शस्त्र धारण कर लिए। उन्होंने शूद्रों तथा अछूतों को बिना उनकी मुसीबतों को सुने शस्त्रहित ही रखा। यदि आज भारत की अधिकांश जनसंख्या में लोग पौरूषहीन हैं, उनका मनोबल नष्ट हो गया है और अमानवीय हैं, तो उसका मुख्य कारण है ब्राह्मणों की शूद्र-दोही नीति, जिसे वे युग युगांतर से अपनाते चले आ रहे हैं। कोई भी ऐसी सामाजिक कुरीति तथा सामाजिक कुप्रथा नहीं है, जिस पर ब्राह्मणों के मुहर न लगी हो। मानस का मानव के प्रति अमानुषिक व्यवहार जैसे कि जात-पात की भावना, अस्पृश्यता, उच्च पद पर पहुंचने पर रोक, योग्यता की अनदेखी करना ब्राह्मणों का धर्म है। यह मान लेना गलत न होगा कि किसी मनुष्य द्वारा दूसरे के साथ ऐसे पाश्विक व्यवहार करना ही ब्राह्मण धर्म है, क्योकि ब्राह्मणों ने समाज की पतिततम प्रथा को शह दी, जिससे भारत में स्त्रीयों को जितने घोर कष्ठ उठाने पड़े उनकी संसार के किसी अन्य भाग से तुलना नहीं की जा सकती। भारत में विधवाओं को सती होने के नाम पर जीवित आग में झोंक दिया जाता था। ब्राह्मणों ने सती प्रथा को पूर्ण समर्थन दिया। विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह करने पर प्रतिबंध लगा दिया।