नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 83

66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ब्राह्मणों ने इस आचरण को दृढता से स्थापित किया। बालिकाओं का विवाह आठ वर्ष की अवस्था में पहले कर दिया जाता था और पति को अधिकार था कि किसी भी समय वह विवाह तोड़ सकता था, चाहे वह लड़की पूर्ण यौवन प्राप्त कर रजस्वला आयु की हुई हो अथवा नहीं । ब्राह्मणों ने इस सिद्धांत को पूरा प्रोत्साहन दिया। शुद्रों, अछूतों और नारी के लिए ब्राह्मणों ने जो घृणित विधान रचे संसार के किसी भी भाग में किसी बौद्धिक वर्ग में उनका सानी नहीं। क्योकि संसार के अन्य भागों में बौद्धिक वर्ग न अपने ही देश के अशिक्षित लोगों को सदा के लिए अज्ञानता और निर्धनता के गर्त में धकेलने को अपनी स्थिति के दुरूपयोग का आविष्कार नहीं किया जैसा कि भारत में ब्राह्मणों ने किया है। आज का प्रत्येक ब्राह्मण अपने पूर्वजों द्वारा प्रतिपादित ब्राह्मणवाद के दर्शन में पूरा विश्वास रखता है। यह हिन्दू समाज में एक निराली ही चीज है। शूद्र और अछूत ब्राह्मण के लिए विदेशी जैसे हैं जैसा कि जर्मन के लिए फ्रांसीसी, जैसे कि यहूदी के लिए गौर यहूदी, गोरों के लिए नीग्रो। उसके और निम्न वर्गीय शूद्रों तथा अछूतों के बीच यह वास्तविक गहरी चोड़ी खाई है। ब्राह्मण उनसे केवल परहेज नहीं करता, बल्कि उनके प्रति कठोर है। उनके आपसी संबंध में विवेक और न्याय की कोई गुंजाइश नहीं।

बनिया इतिहास में निकृष्टतम अमरबेल के नाम से पुकारा जाता है। उसकी संस्कृति और प्रवृत्ति मात्र धन बटोरना है। वह उस पिस्सू के समान है जो किसी भयंकर महामारी के समय तेजी से पनपता है। उसमें और बनिए में केवल इतना अंतर है कि पिस्सू स्वयं कोई महामारी नहीं फैलाता, जबकि बनिया महामारी पैदा करता है। वह अपने धन को उत्पादक कार्यो में नहीं लगाता, बल्की गरीबी और अधिक गरीबी बढाने के लिए अनुत्पादक कार्यो के लिए ऋण देने में लगाता है। वह ब्याज पर जीता है, जिसे वह उचित और न्यायपरक तथा धार्मिक मानता है। ब्राह्मण न्यायधीश की सहायता से अपना धंधा फैलाता है। ब्याज, चक्रवृद्धि ब्याज सब जोड़ते हुए, वह करोड़ो निर्धनों को अपने जाल में फांस लेता है। कर्जदार जितना भी ऋण अदा करता है, कर्जा बढ़ता ही जाता है। ऐसा करने में बनिये को किसी जमीन की आवश्यकता नहीं । वह इसे छल-कपट नहीं समझता और सभी तरह से वाक्छल करता है। राष्ट्र पर उसका पूरा नियंत्रण होता है। सारे निर्धन भूखे नंगे बनिए के बंधक बन कर रह गए हैं।

प्रत्येक देश में शासक वर्ग होते हैं। कोई देश उनसे मुक्त नहीं है। परंतु क्या विश्व में कही और ऐसी स्वार्थी, दूषित, खतरनाक और भ्रष्ट मनोवृत्ति मौजूद है जिसका इतना जघन्य और कुख्यात सोच हो जो शासित जातियों को पददलित करने की हामी हो, ताकि शासक जातियों की शानोशौकत को कायम रखा जा सके। मैं किसी को