नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 85

68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लोगों ने समझ लिया की जब तक वर्गवाद को तिलांजलि नहीं दी जाएगी, सभी को समानता और समान नागरिकता देना और समान सामंतवाद को त्याग देना असंभव है। तदनुसार दमिया लोग जो राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत थे और राष्ट्रीय एकता में कोई बांधा उत्पन्न नहीं करना चाहते थे, अपनी सुविधाओं का परित्याग करने के लिए आगे आए और सर्वसाधारण में शामिल हो गए। 5 मार्च 1869 को उन्होंने सम्राट को, जो ज्ञापन दिया था, वह इस प्रकार थाः-

फ्हम जिस भूमि पर रहते हैं, सम्राट की है। जो अनाज हम लोग खाते है, सम्राट के आदमियों द्वारा पैदा किया जाता है। तो हम किसी जायदाद को अपनी कैसे कह सकते है? अब हम स्वेच्छा से अपनी संपत्ति सादर समर्पित करते हैं और हमारे समुराई तथा जनसामान्य भी आपसे अनुरोध करते हैं कि सम्राट उन लोगों को संपत्ति देने की कार्यवाई कराए जिन्हे वास्तव में यह मिलनी चाहिए और उन्हें दंडित करें, जो उस संम्पति के रखने का अधिकारी नहीं है। शासन विभिन्न वंशो और जातियों की भूमि सम्पति का हस्तांतरण करने और वर्तमान सांचे में ढालने के लिएऽ आवश्यक आदेश जारी करें। दीवानी एवं दंड संहिता और सैनिक कानूनों में एकरूपता लाकर युद्ध आयुधों का निर्माण हो। साम्राज्य के सभी कार्यकलाप सम्राट को सौंप दिए जाएं।य्

जापान में शासक वर्ग की तुलना भारत के शासक वर्ग से कैसे की जा सकती है? यह पूर्णतया इसके विपरीत है। दुर्भाग्य से अभी भारत में शासित जातियों द्वारा शासक जातियों का जुआ उतार फैंकने का इतिहास नहीं लिखा गया है, परन्तु उन्हें इस विषय में ज्ञान है, वे जानते है कि भारत में शासक वर्ग भारतीय स्वतत्रंता की बलिवेदी पर ऐसा बलिदान करने का संकल्प नहीं कर सकता। राष्ट्रीयता के नाम पर अपनी सुख-सुविधाओं का परित्याग करने के बजाय भारत का शासक वर्ग अपनी सुख-सुविधाओं को स्थायी बनाए रखने के लिए हर तरीका अपनाता है। वह जो हथियार अपनाता है उनमें पहला है राष्ट्रीयता का नारा। जब कभी शोषित वर्गो के लोग सरकारी सेवाओं में, कार्यपालिका में तथा विधायिका में आरक्षण की मांग करते हैं, तो शासक जातियां फ्राष्ट्रीयता खतरे में हैय् की दुहाई देती है। कहते है की यह आरक्षण क्या बला है? इस संक्षेप में इस प्रकार कहा जा सकता है कि वे उसे हीले हवाले से टालना चाहते है जबकी शासक जातियां शासित जातियों के अपना अस्तित्व बनाए रखने के संघर्ष को दबा नहीं पाएंगी। आरक्षण की मांग कोई पाप नहीं है और न ही यह कोई अनुचित मांग है। शासक जातियों की इस पर क्या प्रतिक्रिया है? वे इसकी भर्त्सना करने और इसका मखौल उड़ाने का मौका नहीं चूकते। लोगों सक

ऽ रोमेन्स ऑफ जापान लेखक जेम्स ए.बी. सरेर ।