नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 86

परिशिष्ट 69

कहा जाता है कि यदि हमें राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त करनी है, तो हमें राष्ट्रीय एकता बनाए रखनी चाहिए और सरकारी सेवाओं में, कार्यपालिका में तथा विधान सभाओं में आरक्षण आदि राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल है। इसलिए जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हे इस प्रकार के आरक्षण की मांग का डट कर विरोध करना चाहिए। यह है भारत के शासक वर्ग की मनोवृत्ति। भारत की शासक जातियां जापान की शासक जातियों से पूर्णतया विपरीत दृष्टिकोण रखती हैं। यह तो राष्ट्रीयता के नाम का दुरूपयोग करना है। शासक जातियों को उसके दुरूपयोग का कोई पश्चाताप भी नहीं है।

शासक जातियों ने जो दूसरा तरीका अपनाया है, वह है कि शासक जातियों के कुछ प्रतिष्ठित सदस्य इस हद तक पहुंच गए हैं की उन्होंने शोषित जातियों की मांग को बकवास और हास्यास्पद बताते हुए प्रचार करने के लिए कटाक्षपूर्ण व्यंग्यात्मक पेरोडी लिखी। डाक्टर आर.पी. परांजये जो आस्ट्रेलिया में नए हाई कमिश्नर बना कर भेजे गए थे उन्होंने पेरोडी लिखी थीऽ जो आधुनिक उदारवाद का दंभ भरते हैं। उन तक से यह न बना कि वे अपने मनोभावों को दबा पाते। वे इतना घटिया मखौल करने से बाज नहीं आए। सभी पेरोडियों में यह सबसे तीखी थी। जब उनकी ये रचनाएं छपीं तो इससे शासित जातियों में बहुत क्षोभ फैला।

शासक जातियां मेहनतकश जातियों की मांग का विरोध करने के लिए जो दलील देती है, उसका आधार कार्यक्षमता का सिद्धांत बताया जाता है। उसे देशभक्ति का रंग देने के लिए शासक जातियां कहती हैं। भारत का उद्देश्य सक्षम राजनीतिक ढांचा बनाए रखना होना चाहिए और यह तभी हो सकता है जब सत्ता के क्षेत्र में श्रेष्ठतम व्यक्तियों को रखा जाए। इस तर्क से विदेशी प्रभावित हुए लगते हैं और इसी कारण वे आरक्षण का विरोध न भी करें पर उसकी आलोचना अवश्य करते है। इसलिए यह आवश्यक कि इस तर्क का औचित्य जांचा परखा जाए और जो लोग यह तर्क देते हैं कि उनकी मनोभावना क्या है, इसका पता लगाया जाए।

इस सिद्धांत पर किसी को कोई आपत्ति नहीं कि योग्यतम व्यक्ति की जगह उससे कम

ऽ डॉ.आर.पी. परांजपे द्वारा लिखितौपेरोड़ी गुजरात पंचौ के मई 1926 के अंक में छपी थी। इसका शीर्षक था फ्ए पीप इन टू द फयुचरय्। शासक जातियों के लेखों का यह देखने योग्य नमूना है। साम्प्रदायिक आरक्षण के सिद्धांत के अनुसार कुछ कल्पित घटनाओं पर यह एक कटाक्ष है। क्याकि पत्रिका आसानी से उपलब्ध नहीं है मैं उसे नए सिरे पेश कर रहा हुंः

निम्नांकित सार संक्षेप 1930-50 के दौरान प्रकाशित आयोंगों के प्रतिवेदनों पुलिस के अदालती मामलों के रिकार्डो, अदालती मुकदमों, परिषद कार्यवाहियों, प्रशासननिक रिपोर्टो आदि से गुजराती पंच के पाठकों के लिए प्रकाशित की गई है।