नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 94

परिशिष्ट 77

भारत में लोकतंत्र की स्थापना के इच्छुक लोगों को जिन मुख्य समस्याओं का समाना करना पड़ सकता है वे हैं - फ्

(1) भारत में शासक जातियों की स्थिति,

(2) मेहनतकश जातियों के प्रति शासक जातियों का लक्ष्य और उद्देश्य,

(3) मेहनतकश जातियों द्वारा संवैधानिक संरक्षण की मांग का औचित्य, और

(4) शासक जातियों के कांग्रेस से संबंध।

पहले मुद्दे के बारे में तर्क यह है कि भारत में शासक जातियों की स्थिति संसार के अन्य भागो से भिन्न है। इसकी भिन्नताओं को समझ पाना सरल नहीं है, न ही लिखित अभिव्यक्ति उद्देश्य को पूरा कर सकती है। शायद व्याकरण के संयोजक और वियोजक चिन्हों का उदाहरण स्थिति स्पष्ट कर सकता है। संयोजक और वियोजक चिन्हों को समझने में कोई भूल नहीं कर सकता। वियोजक विभाजन करता है, परंतु कही भी संयोजन नहीं करता। संयोजक में दोनों गुण है। यह वाक्य को विभाजित करता है और संयोजित भी। भारत में शासक जातियों और मेहनतकश जातियों के बीच में वियोजक चिन्ह् हैं, जो दोनो को विभाजित करता है। अन्य देशो में संयोजक चिन्ह हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अंतर बहुत निर्णायक है। अन्य देशो में शासक वर्ग में बराबर घट-बढ़ होती रहती है। कोई वर्ग जब उच्च स्थान से हट जाता है, तो नीचे से दूसरा वर्ग इसकी जगह ले लेता है, जो अपना स्तर ऊंचा उठा लेता है। भारत में शासक जातियों के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खिंची है जिससे उन्हें जन्म से मृत्यु तक वहीं रहना है। जिसका जन्म इस वर्ग में नहीं हुआ है, वह इस परिधि में घुस ही नहीं सकता। अन्य देशो में ऐसी परिधि नहीं है कि शासक वर्ग और दूसरो के बिच सामाजिक अंतराल हो। उन देशों की मानसिकता में समायोजन भाव है, जिसके कारण शासक वर्ग शासित वर्ग के प्रति इतना हठधर्मी नहीं है। दूसरे शब्दों में अन्य देशों का शासक वर्ग की एक परिधि है। उसकी परंपराए, समाज-दर्शन और दृष्टिकोण मेहनतकश जातियों के प्रति कठोर है। वह परिधि अटूट हैं। उसमें प्रभुता और दासता का भेद गहराई से पैठा हुआ है, जिनके बीच संपन्नता और विपन्नता का स्थाई और स्पष्ट अंतर है। दूसरे शब्दो में, भारत की शासक जातियां केवल असामाजिक ही नहीं हैं, बल्कि यह निश्चित रूप से समाज-विरोधी है।

मेहनकश जातियों की आरक्षण की मांग के पीछे आशय यह है कि शासक जातियों के अधिकारों पर सीमा लगाई जाए, जिसके रहते वे सरकारी तंत्र पर नियंत्रण कर लेते है। शासक जातियां आरक्षण को बदनाम कर रहीं है, ताकि उन लोगो की आवाज को ही दबा दे, जो उस पर जोर दे रहें है। वास्तविकता यह है कि आरक्षण