नवम् अध्याय विदेशियों के लिए दलील दास्ता का दर्द बर्दास्त नहीं - Page 96

परिशिष्ट 79

यदि विदेशी इन विचारों को ध्यान में रखेगा, तो उसे समझ में आ जाएगा कि भारत की मेहनकश जातियां कांग्रेस छाप स्वराज्य से क्यों प्रभावित नहीं हैं। कांग्रेस छाप स्वराज्य उनका क्या उपकार कर सकता है? वे जानते हैं कि कांग्रेस छाप स्वराज्य में उनका भविष्य अंधकारमय बना रहेगा। कांग्रेस छाप स्वराज्य या तो गांधीवाद की परिणति होगी या यह वैसा ही होगा, जैसा शासक जातियां चाहती हैं। यदि यह पहले वाला होगा, तो इसका अर्थ होगा, जैसा चरखा कातना, ग्रामोद्योग, जातपांत का बोलबाला, ब्रह्मचर्य, गोभक्ति और ऐसी ही चीजें। यदि इसे शासक जातियोंकी कृपा पर छोड़ दिया जाएगा, तो उसका प्रमुख कार्य होगा यह देखना कि मेहनकश जातियों को कैसे दबाया जाए और उनकी सुविधाओं के कैसे बंद किया जाए, जो शिक्षा और उनकी सरकारी सेवाओं के बारे में दी गई हैं।

कुछ लोगों को आशा है कि स्वराज्य के अन्तर्गत काश्तकारी कानूनों, फैक्ट्री अधिनियमों, अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, नशाबंदी और सड़क तथा नहरों का निर्माण, मुद्रा सुधार, माप-तौल विनियमन, दवाखानों और मेहनकश जातियों के लिए सुविधाओं में सुधार होगा। मुझे इस बात पर पक्का भरोसा नहीं है कि कांग्रेस ऐसे कार्यक्रमों का प्रचार क्यों करती है। वह यह बताना चाहती है कि कांग्रेस ब्रिटिश नौकरशाही से बेहतर है। परंतु एक बार यदि नौकरशाही का सफाया हो गया, तो लोगों के कल्याण के वैसे ही प्रोत्साहन मौजूद रहेंगे? यही प्रश्न है। पहले तो मुझे इस बाबत गंभीर संदेह है कि यह किस प्रकार संभव होगा। फिर दूसरी कोई बड़ी चीज भी नहीं है। आज कोई भी सरकार समाज को आधुनिक रूप दिए जाने के कार्यो की उपेक्षा नहीं कर सकती। इसी के साथ साथ क्या स्वराज्य का अंतिम लक्ष्य सबके कल्याण और सामाजिक उत्थान होगा? मैं मेहनतकश जातियों को बखूबी जानता हूं, इसमें मेहनकश जातियों का कोई दोष नहीं है। वे निश्चित रूप से उस उपदेश का पालन करने को तैयार नहीं है कि फ्देख पराई चुपड़ी मत ललचाए जी, रूखा सूखा खाय के ठंडा पानी पी।य् सदियों से भुख और गरीबी उनकी नियति रही है। परंतु उसके सामने यह कुछ नहीं है, जो अपमान और तिरस्कार वे इस विषैली सामाजिक व्यवस्था के कारण झेलते हैं। उन्हें रोटी नहीं सम्मान चाहिए। यह तभी हो सकता है जब शासक जातियां लुप्त हो जाएं और उनकी भाग्यविधाता न रहें। मेहनकश जातियों के सामने सवाल यह नहीं है कि यह सुधार किया जाए या वह। प्रश्न यह है कि क्या जब भारत की शासक जातियां सरकारी तंत्र पर हावी हो जाएंगी तो वे ऐसी सामाजिक उत्थान के कार्य से अलग कर दी जाएंगी। इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि भारत के भावी संविधान में मेहनतकश जातियों के संरक्षण और सुरक्षा होगी या नहीं । यदि संरक्षण रहे, तो मेहनकश के लिए यह संभव हो सकेगा कि कालांतर में वे