परिशिष्ट 81
ही है? ब्राह्मण और बनियों के अतिरिक्त बहुसंख्यक जनता कांग्रेस का झंडा थामती है उसका कांग्रेस की नीति-निर्धारण में कोई योगदान नहीं है। क्या महान व्यक्तित्व वाले उपरोक्त विदेशी यह नहीं समझते कि जिन कारणों से सुल्तान इस्लाम को और पोप कैथोलिक धर्म को नहीं मिटा सके, वैसे ही शासक वर्ग इस मकड़जाल को नहीं तोड़ेगा और वह जब तक ब्राह्मण की श्रेष्टता पर चोट नहीं करेगा तब तक वह ब्राह्मण और सहयोगी जातियों की श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाता ही रहेगा जिससे शूद्रों और अछूतों का दमन और तिरस्कार होता है और भारत की आजादी के बाद भी सरकार की वही पवित्र नीति रहती है। क्या वे नहीं जानते कि भारत का शासक वर्ग देश का लोक-मानस नहीं है? वह उनसे न केवल कटा हुआ है, बल्कि खुद भी बच कर चलता है। उसे डर है कि कहीं उसे छूत न लग जाए, क्योंकि ब्राह्मणों ने उल्लू की लकड़ी घूमा रखी है। उसकी सोच और हित उनसे टकराते हैं, जो उनके समाज से बहिष्कृत हैं और दलित दमित के प्रति उसकी कोई सहानुभूति नहीं है। उसके मन में दलितों की आकांक्षओं और दुखदर्द को समझने की संवेदना नहीं हैं, उन्हें शिक्षा और उच्च सरकारी रोजगार दिलाने का उसे अहसास नहीं है। वह उनके सम्मान और स्वाभिमान जगाने वाले आंदोलनों का विरोध करता है। क्या ये विदेशी नहीं जानते है कि भारत के स्वराज्य में 6 करोड़ अछूतों का भाग्य भी अन्तर्ग्रस्त है?
यह कहना असंभव सा प्रतीत होता है कि ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेता किंग्सले मार्टिन, ब्रेल्सफोर्ड और लास्की जिनके लेख स्वतंत्रता और प्रजातंत्र के विषय में सभी दबे पिछडे लोगों में प्रेरणा जगाने वाले हैं, वे भारत की इन बातों को नही जानते। तब भी वे भारत के संदर्भ में जब कुछ कहते है, तो कांग्रेस का ही समर्थन करते हैं। वे शायद ही कभी अछूतों की समस्या पर मुंह खोलते हों, जिस पर सभी प्रगतशील और प्रजातंत्रवादियों का ध्यान जाना चाहिए था। इन विचारों द्वारा केवल कांग्रेस कार्यकलापों पर ध्यान जाना, भारत के राष्ट्रीय जीवन के अन्य तत्वों की उपेक्षा करना, इस बात को स्पष्ट करता है कि उन्हें गुमराह किया गया है। यदि कांग्रेस राजनैतिक प्रजातंत्र के लिए लड़ाई लड़ती होती, तो कांग्रेस को समर्थन देना ही भली भांती तब समझा जा सकता था, परंतु क्या ऐसा है? सब जानते है कि कांग्रेस केवल राष्ट्रीय आजादी की लड़ाई लड़ रही है, राजनैतिक प्रजातंत्र में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह पार्टी जो भारत में राजनैतिक प्रजातंत्र की लड़ाई लड़ रही है, वह केवल अछूतों की पार्टी है, जिसे आशंका है कि कांग्रेस की आजादी की यह लड़ाई यदि कामयाब हो जाती है तो इसका अर्थ होगा शक्तिशाली वर्ग को ही स्वतंत्रता मिलेगी और वह अधिक शक्ति के साथ कमजोरों और दलितों को, तब तक दबाएगा, जब तक कि उनकी सुरक्षा के लिए संवैधानिक संरक्षण न दिया जाएगा। यह वही दलित वर्ग है, जिसे