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ऽखदान प्रसूति लाभ (संशोधन) विधेयक
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः (श्रम सदस्य)ः श्रीमान्, मैं प्रस्ताव करता हूंः
‘कि खदान प्रसूति लाभ अधिनियम, 1941 में संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए।’
सदन यह जानना चाहेगा कि यह संशोधन क्यों आवश्यक हो गया है। वर्तमान
खदान प्रसूति लाभ विधेयक के तहत, खान की एक महिला कर्मचारी 8 हफतों का लाभ आठ आना प्रतिदिन की दर से ले सकती है। यह आठ हफते का समय चार-चार हफते के दो भागों में बांटा गया है। पहला भाग प्रसव के पहले और दूसरा प्रसव के बाद। पहले भाग में महिला स्वैच्छिक आराम कर सकती है और चाहे तो निरंतर काम करके पूरा वेतन अर्जित कर सकती है। आराम के लिए काम से गैर-हाजिर रहने पर वह प्रसूति लाभ पा सकती है। प्रसूति के बाद का चार हफते का समय आवश्यक आराम का समय है जिसमेंं किसी महिला को काम नहीं करना चाहिए। वास्तव में, इस अवस्था में उसका काम करना गैर-कानूनी और आपराधिक है और उसे केवल प्रसूति लाभ पर ही संतुष्ट होना है। प्रसूति लाभ विधेयक की धारा 5 में प्रसूति लाभ की अदायगी का प्रावधान किया गया है। यदि माननीय सदस्य इस प्रावधान की पंक्ति 9 में काम के संदर्भ में वर्णित शब्दों की ओर ध्यान दें तो पाएंगे कि शब्दावली ‘काम से गैर-हाजिर’ का प्रयोग किया गया है। अब यह सुझाव दिया गया है कि विशेषकर ‘काम से गैर-हाजिर’ या फिर ‘काम से’ शब्द अस्पष्ट है और मैं संक्षेप में स्पष्ट करूंगा कि इनमें क्या अस्पष्टता है।
मान लीजिये कि खदान के मालिक ने किसी विशेष दिन खदान बंद कर दी, तो क्या उस दिन महिला कर्मचारी को प्रसूति लाभ पाने का अधिकार है? कहा जाता है कि ‘नहीं’, क्योंकि ‘काम से गैर-हाजिर’ शब्दों की जटिलता से यह भी अर्थ निकलता है कि ‘काम’ तो है किन्तु जब खदान बंद कर दी गई तो काम नहीं है।
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केन्द्रीय) खंड 3, 29 जुलाई, 1943, पृष्ठ 180