16. युद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक - Page 102

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ऽयुद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः (श्रम सदस्य)ः मैं प्रस्ताव करता हूंः

‘कि युद्ध से आहत होने वाले कामगारों को मुआवजा देने का दायित्व नियोजकों पर अधिरोपित करने और ऐसे दायित्व के लिए नियोजकों द्वारा बीमा कराने का उपबंध करने वाले विधेयक पर, प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में, विचार किया जाए।’

पिछली बार जब विधेयक को सदन में प्रस्तुत किया गया था उस समय मैंने विधेयक के लक्ष्यों को स्पष्ट किया था। इसलिए उन्हीं बातों को फिर दोहराना मेरे लिए आवश्यक नहीं है। मैं संक्षेप में प्रवर समिति द्वारा मूल विधेयक में वर्णित सिद्धांतों में किए गए परिवर्तन के संबंध में सदन को बताना चाहूंगा। सदन ने ध्यान दिया होगा कि प्रवर समिति द्वारा परिवर्तन किए जाने के बावजूद भी, वास्तव में केवल चार परिवर्तन ऐसे हैं जिनका सिद्धात से संबंध है। पहला तो यह कि कामगारों के वर्गों का विस्तार किया गया है जिन पर यह विधेयक लागू होगा हमने अब बागानों के कर्मचारियों को भी शामिल कर लिया है। दूसरा परिवर्तन जो किया गया है वह बीमा कोष में किए जाने वाले पहले अंशदान की दर से संबद्ध है। मूल रूप में विधेयक द्वारा सौ रुपयों पर आठ आना की दर लगा करती थी। अब यह आठ आना से घटाकर चार आना कर दी गई है। तीसरा परिवर्तन, शेष बचे धन को बीमा कोष में प्रयुक्त करने के संबंध में है। विधेयक का मूल प्रस्ताव यह था कि बचे हुए धन को आम राजस्व में मिला दिया जाए और सरकारी व्यय की आम मदों पर इस्तेमाल किया जाए। प्रवर समिति ने परिवर्तन किया है कि बचे हुए धन को अंशदान करने वाले नियोजक को, उसके द्वारा दिए गए अंशदान के अनुपात में, वापस कर दिया जाए। चौथा परिवर्तन ठेके के श्रमिकों के संबंध में है। अब व्यवस्था दी गई है कि उन मामलों में, जहां नियोजक ठेकेदार नियुक्त करता है और ठेकेदार उस काम को कराने के लिए कामगारों को काम पर लगाता है, मुआवजा अदायगी के संबंध में नियोजक का दायित्व होगा।

ये ही वे सिद्धांत हैं जिनमें प्रवर समिति ने परिवर्तन किए हैं। जैसा कि सदन देखेगा,

ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केन्द्रीय) खंड 3, 13 अगस्त, 1943, पृष्ठ 701