16. युद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक - Page 106

युद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक

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इस संशोधन से समर्थन में अधिक स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं है। जैसा कि सदन को याद होगा, यह धारा जैसी कि इस समय है, सरकारी कर्मचारियों तथा रेल कर्मचारियों को इस विधेयक की परिधि से बाहर करती है। जब मैंने प्रथम वाचन के लिए विधेयक को पेश किया था तब सदन को बतलाया था कि यद्यपि यह विधेयक इस श्रेणी के कर्मचारियों पर लागू नहीं होता, तथापि सरकार ने अपने कर्मचारियों को मुआवजा देने के बहुत सारे प्रावधान किए थे। दुर्भाग्य से मेरा भाषण स्पष्टतः सदन के कुछ सदस्यों को संदेह दूर नहीं कर सका और वे जोर देते रहे कि प्रशासनिक ढंग से उत्तरदायित्व लेने की अपेक्षा कानून के द्वारा उत्तरदायित्व आरोपित किया जाए। महोदय, मैं सुझाव स्वीकार करता हूं और इसलिए मैं बाद में धारा 3 के संशोधन को, जो मेरे नाम पर है, पेश करूंगा। महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूंः

‘‘कि विधेयक के खंड 6 के उपखंड 2 का लोप किया जाए।’’

ऽअध्यक्ष महोदय (माननीय सर अब्दुर रहीम)ः प्रश्न यह हैः

‘‘कि धारा 6, संशोधित रूप में, विधेयक का अंग बने।’’

प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।

खंड 6, संशोधित रूप में, विधेयक में जोड़ दिया गया।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूंः

‘‘कि विधेयक के खंड 7 के उपखंड 5 के भाग (छ) में निम्नलिखित

परंतुक और जोड़ा जाएः’’

‘‘बशर्ते, यह और भी कि खंड ग के उपखंड 2 के अंतर्गत यदि केंद्रीय

सरकार ने कोष में कोई अग्रिम धन अदा किया है, तो पहले भुगतान के बाद

किन्हीं आवधिक भुगतानों की दर उस दर से अधिक नहीं होगी जिससे कि

कोष की राशि अनुमानतः 15 लाख रुपए हो जाती हो।’’

इस परंतुक का अभिप्राय नियोजक वर्ग के प्रतिनिधियों के कुछ संदेहों का समाधान करना है। उनको यह संदेह था कि हम इस धारा के प्रावधानों का, जैसा कि वे मूल रूप में थे, कोष की राशि को किसी भी सीमा तक बढ़ाने के लिए प्रयोग कर सकते हैं और जिस उद्देश्य से इसकी व्यवस्था की गई है, व्यावहारिक रूप से उसकी आवश्यकता न होने पर भी धन संचित करेंगे। मैंने पहले ही सदन को यह आश्वासन दिया था कि सरकार की इस विधेयक के अंतर्गत दिए गए अधिकारों का

ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केन्द्रीय) खंड 3, 13 अगस्त, 1943, पृष्ठ 712