16. युद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक - Page 108

युद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक

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मेरे विद्वान मित्र क्यों नियोजक की सुविधा हेतु 15 दिन की अतिरिक्त छूट समय-सीमा में बढ़ाने के इच्छुक हैं। यदि हमने नोटिस दिए जाने की व्यवस्था न की होती, तो मैं समझ सकता था कि समय में छूट के दावे का कोई औचित्य है। किन्तु यदि मेरे विद्वान मित्र आज्ञा दें। तो मैं कहना चाहूंगा कि नोटिस के समय और छूट के समय में कोई अंतर नहीं है या फिर बिना किसी के यह भेद किया जा रहा है।

श्री हुसैन भाई ए. लालजीः महोदय, मेरे विचार से, मेरे माननीय मित्र श्री अब्दुर रशीद चौधरी ने जो निवेदन किया है वह बहुत उचित है। चाहे जो कुछ भी कहिए, व्यापारिक जीवन में प्रबंध तो करने ही पड़ते हैं, और जब हम अनेक लोगों को समाहित कर रहे हैं तो 15 दिन का नोटिस और 15 दिन की छूट देने से कोई

खास अंतर नहीं पड़ता। मैं तो सभी 30 दिनों के लिए ‘नोटिस’ शब्द के स्थान पर ‘छूट’ शब्द अधिक पसंद करता हूं क्योंकि 15 दिन की छूट एक ऐसा मामला है और बिल्कुल ऐसा मामला है जिसे सरकार अपनी दायनतदारी से दे सकती है। अतः मैं सोचता हूं कि यह अच्छा होगा कि जो लागे यह समझते हैं कि हम भारतवासी विश्व के अन्य लोगों से अधिक बेईमान हैं, मेरे मित्र उस दिशा में सोचने को बाध्य न हो।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं 15 दिन की छूट के लिए तैयार हूं।

* * *

ऽअध्यक्ष महोदय (माननीय सर अब्दुर रहीम)ः प्रश्न यह हैः

‘‘कि विधेयक के खंड 11 के उपखंड (1) में निम्नलिखित पंरतुक

जोड़ा जाए।’’

‘‘बशर्ते ‘ताज’ अर्थात ‘सरकार के’ दायित्व निर्वाह की दिशा में इसके

द्वारा भुगतान कर्मचारी को इस निधि में से किसी भी मुआवजे का भुगतान

नहीं किया जाएगा।’’

प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।

माननीय डा. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय मैं प्रस्ताव करता हूंः

‘‘कि विधेयक की खंड 11 की उपखंड (3) के स्थान पर निम्नलिखित

अन्तःस्थापित किया जाए’’ः

‘‘(3) यदि इस निधि से किए जाने वाले सभी भुगतान चुका देने के

ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केन्द्रीय) खंड 3, 13 अगस्त, 1943, पृष्ठ 714-715