84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बाद कुछ शेष बचता है तो उस शेष से एक ऐसा कोष बनाया जाएगा जिसे
केंद्रीय सरकार द्वारा कर्मचारियों के हितों के लिए प्रयुकत और प्रशासित
किया जाएगा।’’
विधेयक को सदन में पेश करते समय जैसा कि मैंने मूल स्थिति के संबंध में संकेत दिया था, बचे हुए धन को सरकार की आम मदों पर प्रयुक्त होगा और इसे सरकार के आम राजस्व में शामिल किया जाएगा। प्रवर समिति ने इस खंड में परिवर्तन कर दिया और व्यवस्था दी कि यदि कोई धनराशि बचती है तो वह नियोजक को उसके अंशदान, जो उसने इस निधि के लिए दिया है, के अनुपात में उनको वापस की जानी चाहिए। मैं जो संशोधन पेश कर रहा हूं वह एक ऐसा संशोधन है जो इन दोनों स्थितियों का मध्य मार्ग है। मैं यह सुझाव देता हूं कि धन न तो सरकार द्वारा आम मदों पर खर्च किया जाए और न ही नियोजक को वापस किया जाए, अपितु इसे एक न्यास कोष माना जाए जिसे केंद्र सरकार कर्मचारियों के हित में प्रयुक्त व प्रशासित करेगी। मैंने यही सर्वोत्तम मार्ग सोचा है, और आशा करता हूं कि पूरा सदन बिना किसी विवाद के इसे स्वीकार कर लेगा। किन्तु मैं देखता हूं कि अब भी सदन में कुछ सदस्य इस संशोधन में दी गई व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं। मेरे नाम पर जो संशोधन हैं, सर्वप्रथम मैं उनके आधार बिंदुओं का औचित्य स्पष्ट करता हूं। मेरे विचार में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि नियोजकों द्वारा बीमा निधि के लिए जो भी अंशदान किया जाएगा उसे वित्त विभाग के राजस्व की संज्ञा दी जाएगी और वह ऐसा राजस्व होगा जिसके लिए वित्त विभाग द्वारा ऋण दिया जाएगा। वास्तव में, यह वह राजस्व है जो साधारण परिस्थितियों में आय-कर तथा अतिरिक्त लाभ-कर के रूप में भारत सरकार को जाता है। अतः मैं यह स्पष्ट करने में कोई झिझक नहीं करूंगा कि इस कोष का एक बहुत बड़ा भाग जिनके लिए है, वह उन्हें मिले और वे लोग उसे प्रयोग करें जो उनका है। मैं नहीं समझता कि इसमें कोई ऐसी गंभीर बात है जिसके आधार पर इस व्यवस्था का विरोध किया जाए। किन्तु, जैसा कि मैंने कहा, मैं उस स्थिति से पीछे लौट आया हूं और मैं इस कोष को सामान्य राजस्व न मान कर एक ऋण-कोष मानता हूं जो कर्मचारियों के हित में प्रयुक्त किया जाएगा। जो तर्क मैं सदन में सुन चुका हूं और जो अभी तक मेरे कुछ माननीय सदस्यों के दिल-दिमाग पर हावी है, उसी कारण, सदन में स्थिति स्पष्ट करने पर भी वे स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं। वे यह सोचते मालूम होते हैं कि यह तो ऐसा तरीका है जिसके द्वारा सरकार श्रमिकों के लाभ के लिए उद्योगों पर लेवी लगाने का मार्ग तैयार कर रही है। मैं उन सदस्यों की सोच को बुरा नहीं मानता जिनके मन में इस प्रकार का संदेह है। मैं इससे पहले ही उन्हें आश्वस्त कर चुका हूं कि सरकार,