युद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक
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उद्योगों पर भार डालकर, उन कार्यों के लिए, जिनकी आवश्यकता नहीं है, धन इकट्ठा करने के लिए इस खंड का दुरुपयोग करने की कोई मंशा नहीं रखती। और मैं पुनः उन माननीय सदस्यों को विश्वास दिलाना चाहूंगा जिनके मन में भय है, कि इस तरह चोरी छुपे कोई पूर्व-दुष्टांत स्थापित करना या कराना सरकार के लिए बिल्कुल अनावश्यक है। सरकार के पास बहुत काफी अधिकार हैं यहां भारत में और इंग्लैंड दोनों जगह कानूनन प्रदान किए गए हैं और जिनके माध्यम से सरकार के लिए श्रमिकों के लाभार्थ किसी भी प्रकार की लेवी या उपकर लगाना संभव है। इस देश में हमारे पास कोयला-उपकर तथा कोक-उपकर हैं जो उद्योगों के कार्यों पर या उनके लिए जो उद्योग में कार्यरत हैं किया जाता है_ जो धन राशि उपकर द्वारा इकट्ठी की जाती है वह श्रमिकों के कल्याण के लिए अलग रखी जाती है। अतः मैं माननीय सदस्यों को पूर्ण विश्वास दिलाता हूं कि गोपनीय ढंग से ऐसा पूर्व-दृष्टांत तैयार करने के प्रयास की कोई मंशा नहीं है। हमारी मंशा केवल श्रमिकों के कल्याण की है और मैं नहीं समझता कि बहुत से वे नियोजक जो हमेशा अपने कर्मचारियों के लिए किसी न किसी रूप में कल्याणकारी योजनाओं के प्रति सहृदयता एवं रुचि दिखलाते आए हैं, अब इस संशोधन को जिसे मैं पेश कर रहा हूं, मानने में संकोच नहीं करेंगे। महोदय, मैं संशोधन प्रस्तुत करता हूं।
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ऽमाननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः महोदय, मेरे माननीय मित्र श्री चैम्मैन-मॉर्टीमर ने जो मुद्दा उठाया है, वह यह है कि वह कहते हैं कि हम अपना उद्देश्य बदल रहे है। इस कोष की स्थापना की मूल मंशा तो यह है कि मुआवजा दिया जाए। अब हम शेष बचे हुए धन को कल्याण-कार्यों पर खर्च करना चाहते हैं। निस्संदेह, यह एक परिवर्तन है, इसके उद्देश्य में। किंतु मेरी अभी भी यह मान्यता है कि इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। मुझे यह मानना चाहिए कि इसमें यह एक सुनिश्चित सिद्धांत है कि जब तक कोई धनराशि किसी अन्य मद के लिए स्वीकार नहीं की गई है तब तक उसे उसी मद में खर्च किया जाए जिसके लिए विधानमंडल ने स्वीकृति दी है। मैं इससे पूर्णतः सहमत हूं, किन्तु इस बात का संबंध कार्यकारिणी की कार्यवाही से है। मेरा इस धनराशि को किसी भी कार्यकारिणी की कार्यवाही के माध्यम से प्रयुक्त करने का विचार नहीं है। मैं यह भी नहीं चाहता कि इसके किसी भी तरह के अनुचित व्यय के लिए, मैं अपने आप को दोषी पाऊं, और सदन से यह स्वीकृति मांगू कि बचे हुए धन को किसी ऐसे मद पर खर्च किया जाए जिसे सदन पूर्ण रूप से लाभकारी मानने के लिए सहमत न हो। अतः मेरा निवेदन है कि हम जहां तक
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केन्द्रीय) खंड 3, 13 अगस्त, 1943, पृष्ठ 718