86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उद्देश्य के परिवर्तन पर सदन की विधिवत स्वीकृति की मांग कर रहे हैं उसके उद्देश्य परिवर्तन में कोई अनौचित्य नहीं है।
फिर यह मुद्दा उठाया गया है कि शब्द ‘कल्याण’ बहुप्रयोजनबोधक शब्द है। मैं मानता हूं कि यह एक बहुप्रयोजनबोधक शब्द है, और मैं नहीं समझता कि मैं ऐसे मदों को विशिष्ट रूप से निर्दिष्ट कर सकता हूं जिन्हें ‘कल्याण’ शब्द की परिभाषा की परिधि में शामिल किया जाए और जिनके संबंध में सदन के एकमत होने की आशा की जाती हो। अतः मैं अब यह प्रयत्न नहीं करूंगा कि ‘कल्याण’ शब्द की परिभाषा की परिधि में क्या-क्या शामिल किया जाएगा। किंतु मैं अपने उन माननीय मित्रों से जो यह नहीं जानते कि कल्याण का मतलब क्या है और उन माननीय मित्रों से जो यह सोचते हैं कि सरकार पर इस धन के व्यय की जिम्मेवारी डाली जाए, कहना चाहूंगा कि यह सब सदन के हाथों में छोड़ दिया गया है। इस धन को किस प्रकार उपयोग में लाया जाए, इस प्रश्न को उठाने के अनेक बार सदन को अवसर मिलेंगे और मुझे विश्वास है अनेक माननीय सदस्य जो यह जानते हैं कि ‘कल्याण’ क्या है और जिनको इसकी समझ है उन अवसरों का सरकार को यह सूचित करने के लिए उपयोग करेंगे कि किस प्रकार धन का प्रयोग किया जाए। महोदय, मैं समझता हूं कि सदन बिना दुविधा के मेरा संशोधन स्वीकार कर लेगा।
ऽअध्यक्ष महोदय (माननीय सर अब्दुर रहीम)ः प्रश्न यह हैः
‘‘कि विधेयक के खंड 3 के उपखंड (1) में निम्नलिखित परंतुक
जोड़ा जाएः
‘‘बशर्ते कि धारा 9 की उपधारा (1) की अपेक्षा के अनुसरण में, जहां
किसी नियोजक ने बीमा पालिसी ले रखी है और किस्तों के रूप में ऐसी
सभी भुगतान कर दिए हैं जो योजना के प्रावधानों के अनुसार देय होते हैं
अथवा अनुच्छेद 12 के उप-अनुच्छेद (2) के प्रावधानों के तहत नियोक्ता
बीमा कराने के लिए बाध्य नहीं हैं उस स्थिति में उस नियोक्ता की ओर
से उप-धारा के अंतर्गत उस नियोक्ता द्वारा मुआवजे का भुगतान करने के
दायित्व सरकार स्वयं ले और उसे अंजाम दे।’’
प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूंः
‘‘कि विधेयक के खंड 3 में निम्नलिखित नया उप-खंड जोड़ा जाएः
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केन्द्रीय) खंड 3, 13 अगस्त, 1943, पृष्ठ 719