16. युद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक - Page 112

युद्ध-आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक

‘‘(3) यह धारा सरकार के लिए बाध्यकारी होगी।’’

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मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूं कि हम इस विधेयक के प्रावधानों के प्रति सरकार पर संवैधानिक दायित्व निभाने की जिम्मेदारी सुनिश्चित कर रहे हैं। इसी टिप्पणी के साथ मैं प्रस्ताव पेश करता हूं।

ऽअध्यक्ष महोदय (माननीय सर अब्दुर रहीम)ः संशोधन प्रस्तुत हुआः

‘‘कि विधेयक के खंड 13 के उपखंड (1) के भाग (ख) का लोप

किया जाए।’’

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः महोदय, हो सकता है कि मैं पर्याप्त रूप से सुसंस्कृत न होऊं किन्तु मैं औसत दर्जे की बुद्धि रखने का दावा करता हूं। महोदय, उसी औसत बुद्धि का, जैसा कि मैंने इस खंड में प्रयोग किया है, प्रयोग करते हुए मैं समझता हूं कि मेरे माननीय सदस्य ने इसके उद्देश्य तथा आवश्यकता को नितांत गलत समझा है। वास्तव में, इस खंड का प्रयोजन कोई लेवी लगाना या शक्ति हासिल करना नहीं है, इसका उद्देश्य सूचना प्राप्त करना या सूचना की खोज करना है। मेर मित्र यह नहीं समझे कि इस मामले में सही सूचना की आवश्यकता क्यों बहुत महत्वपूर्ण है। मैं उन्हें बतलाता हूं कि यह सूचना न केवल सरकार के दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण है, वरन स्वयं नियोजकों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। उदाहरणार्थ, बेईमान नियोजकों के लिए यह बिल्कुल संभव है कि वे गलत हों और त्रुटिपूर्ण सूचनाएं दें जिनमें बिलों में मजदूरी कम लिखी हो, उनके नीचे जो मजदूर काम कर रहे हैं उनकी संख्या कम लिखी हो। बीमा की किस्त तो दी गई सूचना पर ही आधारित होगी और अच्छे नियोजकों के संबंध में, यह संभावना है कि वे इसकी सजा भुगतें और उन्हें, बेईमान नियोक्ताओं द्वारा दी गई गलत सूचना के कारण, अधिक भुगतान करना पड़े। अतः यह खंड नितांत आवश्यक है, और स्वयं नियोक्ताओं के हित में आवश्यक है। मैं नहीं समझ सकता कि इसमें केवल इसलिए कोई ऐतराज हो सकता है क्योंकि कानून व्यवस्था देता है कि जब भी किसी दी गई सूचना पर संदेह हो तो सरकार को सही सूचना उपलब्ध करने के अधिकार से लैस होना चाहिए। इस व्यवस्था की मजबूत बुनियाद यह सूचना ही है जिसका सही होना परमावश्यक है। महोदय, मैं संशोधन का विरोध करता हूं।

ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केन्द्रीय) खंड 3, 13 अगस्त, 1943, पृष्ठ 721