पूर्ण श्रम सम्मेलन का प्रथम सत्र
ठोस नीति
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युद्ध के दबाव से भारत सरकार को औद्योगिक समस्याओं और श्रम कल्याण से संबंधित समस्याओं से निपटने की अधिकाधिक आवश्यकता महसूस हुई और मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत सरकार को ठोस कार्रवाई करने में तनिक भी झिझक नहीं हुई।
भारत सरकार ने अकुशल व्यक्तियों को तकनीकी प्रशिक्षण देकर कुशल कारीगर बनाया और इस हेतु अनेक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए।
भारत सरकार ने विद्यमान श्रम संहिता में दो सिद्धांतों का समावेश किया जिनका सुदूरगामी महत्व है और जो परंपरा से कहीं अलग हटकर अपना विशेष महत्व रखते हैं।
सरकार ने इस अधिकार को निभाने में अपना कर्तव्य और दायित्व समझा कि उचित मजदूरी तथा सेवा की उचित परिस्थितियों को निर्धारित किया जाए।
भारत सरकार ने यह भी अपना कर्तव्य और दायित्व समझा कि नियोक्ताओं तथा कर्मचारियों को बाध्य किया जाए कि वे अपने विवादों को पंच-फैसलों के लिए प्रस्तुत करें। केवल इतना ही नहीं भारत सरकार ने श्रमिकों के कल्याण को सुनिश्चित करने का दायित्व भी संभाला जिसके अनुसार केवल दिशानिर्देश का ही काम न था कि श्रमिकों के कल्याण के लिए क्या करना चाहिए, अपितु अपना ऐसा अभिकरण भी नियक्त करना था जो यह देखे कि जारी किए गए निदेशों का पालन होता है अथवा नहीं।
भारत सरकार ने अपनी ही पहल और निर्णय से इस ठोस नीति को अपनाया। फिर भी यह महसूस किया गया कि भारत सरकार की अपनी श्रमिक नीति के लिए अधिक हितकर होगा यदि एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जाए जो प्रांतों और रियासतों की सरकारों, नियोक्ताओं तथा कर्मचारियों से परामर्श कर सके और इस प्रकार अपने उन नवीन कर्तव्यों को विश्वास के साथ निभा सके जो उसे वहन करने हैं।
दो निकायों का गठन
इसी दोहरे उद्देश्य के लिए त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलन का आयोजन किया गया था। सम्मेलन के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या ऐसा समय नहीं आ गया है जब एक स्थायी और प्रतिनिधित्व करने वाले निकाय की स्थापना की जाए ताकि श्रम कल्याण की समस्याओं पर उनके कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं से विचार-विमर्श किया जा सके और वह निकाय भारत सरकार को भी यह परामर्श दे सके कि इन समस्याओं