17. पूर्ण श्रम सम्मेलन का प्रथम सत्रा - Page 115

90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के निराकरण के लिए सबसे संतोषजनक उपाय क्या है। उस समय जो प्रतिनिधि उपस्थित थे, उन्होंने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और दो निकायों के गठन का संकल्प पारित किया। बड़े निकाय को ‘पूर्ण श्रम सम्मेलन’ और छोटे निकाय को ‘स्थायी श्रम समिति’ का नाम दिया गया ।

त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलन की उत्पत्ति युद्ध की आवश्यकता के कारण हुई। परंतु मुझे यह बताने में प्रसन्नता है कि यह सम्मेलन युद्ध के बाद भी बना रहा। अब यह एक ऐसी संस्था का रूप धारण कर रहा है जिसका देश के आर्थिक ढांचे में स्थायी स्थान होगा।

मुझे विश्वास है कि किसी को भी औद्योगिक और श्रम-समस्याओं पर विचार-विमर्श के लिए ऐसे प्रतिनिधि मंच के गठन के निर्णय की बुद्धिमत्ता पर तनिक भी संदेह नहीं होगा। गत तेरह महीनों में जो सर्वेक्षण किया गया है वह इस संदेह को दूर करने के लिए पर्याप्त होगा।

7 अगस्त, 1942 से दोनों निकाय अस्तित्व में आए और तब से स्थायी श्रम समिति की तीन बैठकें हो चुकी हैं। स्थायी श्रम समिति की पहली बैठक की कार्यसूची में युद्धकालीन श्रम कानून, विवादों के समझौते, अनुपस्थिति, कार्य करने के घंटे, औद्योगिक बेगार, स्वास्थ्य अनुसंधान बोर्ड, मजदूरों की आय, मंहगाई भत्ते, लाभ विषयक बोनस, बचत, कल्याण के प्रश्न, लागत पर आधारित अनाज की दुकानें ए.आर.पी और कल्याण-कार्य के लिए संयुक्त समिति और छोटे सिक्कों के अभाव की दृष्टि से मजदूरी की राशि को सुगमांक करने जैसे विषय सम्मिलित किए गए।

दूसरी बैठक की कार्यसूची में शामिल किए गए विषय इस प्रकार के थेः श्रमिकों के लिए आवश्यक खाद्यान्न वस्तुओं की आपूर्ति, भारत सुरक्षा नियम 81-क, और आस्थगित बोनस।

तीसरी बैठक में सरकारी ठेकों में सही मजदूरी के बारे में नियमों, संयुक्त उत्पादन समितियों, औद्योगिक कारोबार में श्रम कार्यालयों की स्थापना, भारत सुरक्षा नियम 81-क का कार्यान्वयन और औद्योगिक सांख्यकीय अधिनियम के अधीन रोजगार कार्यालयों की स्थापना तथा आंकड़ों के संग्रह के बारे में विचार किया गया।

इससे उन सभी विषयों की व्यापक परिधि पर किए गए विचार का पता लगता है जिनके बारे में स्थायी श्रम समिति में विचार-विमर्श किया गया है। यह संभव नहीं हो सका कि ऐसे मामलों पर सर्वसम्मति से निर्णय किया जा सके जिनके बारे में विचार-विमर्श किया गया है।