पूर्ण श्रम सम्मेलन का प्रथम सत्र
अत्यंत उपयोगी
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ये विचारों के आदान-प्रदान अत्यंत उपयोगी रहे और भारत सरकार ने इनसे बहुत लाभ उठाया। सर्वसम्मति के अभाव में, भारत सरकार ने उन मामलों में ठोस कार्रवाई नहीं की जिनके बारे में विचारों का आदान-प्रदान किया गया था। परंतु जहां कहीं भी सर्वसम्मति हुई वहां भारत सरकार ने उन निर्णयों को स्वीकार करने में कोई देर नहीं की और उन्हें कार्यान्वित किया। इसके समर्थन में मैं कुछ मदों का उल्लेख करूंगा जो इस प्रकार हैंः युद्ध से आहत (मुआवजा बीमा) अधिनियम और राष्ट्रीय सेवा (टेक्नीकल कर्मचारी संशोधन) अध्यादेश। अन्य विषय थे - औद्योगिक सांख्यिकीय अधिनियम और रोजगार कार्यालय योजना। इन दोनों विषयों के बारे में सम्मेलन के निर्णयों के अनुसार कार्रवाई शीघ्र ही की जाएगी।
दृष्टिकोण में आधारभूत परिवर्तन
कुछ लोगों को यह प्रगति बहुत कम लगती है। उनसे मैं कहना चाहता हूं कि यह गलत धारणा है। प्रगति का मार्ग छोटा नहीं है और कोई भी आश्वस्त नहीं हो सकता कि छोटा मार्ग सही मार्ग होगा। शांतिपूर्ण साधनों द्वारा प्रगति सदैव धीमी प्रक्रिया होती है और मुझ जैसे अधीर आदर्शवादी के लिए कभी-कभी यह धीमी गति दुःखदायी बन जाती है। भारत जैसे देश में सामूहिक कार्य की कोई परंपरा नहीं है और सामाजिक चेतन के विकास का भी कोई चिह्न नहीं मिलता। अतः प्रगति अपेक्षाकृत धीमी ही होगी। इससे किसी को भी निराशा होने की आवश्यकता नहीं है। मेरी दृष्टि में, प्रगति की गति की अपेक्षा यह ज्यादा जरूरी है कि इसके प्रति दृष्टिकोण क्या है।
इस दृष्टिकोण से त्रिपक्षीय सम्मेलन का अवलोकन करते हुए मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि त्रिपक्षीय सम्मेलन का महान उपलब्धि श्रम समस्याओं पर सरकार और नियोक्ता तथा कर्मचारियों के दृष्टिकोण में आधारभूत परिवर्तन लाना है। इन सम्मेलनों में जिस किसी ने भी भाग लिया है उसे यह एहसास हुआ है। इस दृष्टिकोण में एक स्वस्थ और पूर्ण परिवर्तन आया है और इसलिए हम अपनी प्रगति की गति में तीव्रता लाने के लिए विश्वास के साथ आशा कर सकते हैं।
कार्यसूची के विषय
पूर्ण श्रम सम्मेलन की सूची में आठ विषय सम्मिलित किए गए हैं। ये विषय इस प्रकार हैंः-
(i) कोयला और कच्चे माल आदि की कमी के कारण अस्वैच्छिक बेरोजगार।