92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(ii) सामाजिक सुरक्षा_ न्यूनतम मजदूरी।
(iii) मंहगाई भत्ता निर्धारित करने के सिद्धांत।
(iv) बृहद औद्योगिक फर्मों में, बंबई औद्योगिक विवाद अधिनियम के अध्याय- V
के उपबंधों के आधार पर स्थायी आदेशों के लिए उपबंध।
(v) पूर्ण सम्मेलन के लिए प्रक्रिया के नियमों को स्वीकार करना।
(vi) प्रांतों में त्रिपक्षीय संगठनों का गठन।
(vii) विधानमंडलों और अन्य निकायों में मजदूरों का प्रतिनिधित्व।
(viii) भविष्य निधि के लिए आदर्श नियम।
इन विषयों में दो विषय महत्वपूर्ण हैं जिनके बारे मेंं मुझे विश्वास है कि वे आपके ध्यान से ओझल नहीं होंगे। मैं सामाजिक सुरक्षा और मजदूरों के प्रतिनिधित्व की ओर संकेत कर रहा हूं। इन दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। ये ऐसे मामले हैं जिनके बारे में विश्व भर में गंभीर विचार किया जा रहा है और इस सामान्य रुचि का एक उदाहरण है बैवेरिज रिपोर्ट। हम भारत में उन मुद्दों की ओर से आंखें नहीं मूंद सकते। यह मेरे बताने की बात नहीं है कि आप उनको किस प्रकार सुलझाएं अथवा उनके संबंध में सही दृष्टिकोण क्या होगा। परंतु आप मुझे दो ऐसी बातें बताने की अनुमति देंगे जो इन मामलों से उत्पन्न हुई हैं और वे इन विषयों में निहित हैं। प्रथम बात यह है।
दो विरोधी तत्व
ऐसे व्यक्ति को जो औद्योगिक संगठन के पूंजीवादी तरीके के अंतर्गत रह रहे हैं और संसदीय लोकतंत्र कहे जाने वाले राजनीतिक संगठन के अंतर्गत रहते है।, उन्हें इन पद्धतियों के विरोधी तत्वों को मान्यता देनी चाहिए। पहला विरोधाभास अपार धन और अकिंचन दीनता के बीच अपने सरल रूप में विद्यमान है, अपने सरल रूप में नहीं अपितु उस बढ़े हुए रूप में जिसमें हम उसे देखते हैं - धन उन लोगों के लिए जो काम नहीं करते और दीनता उन लोगों के लिए जो परिश्रम करते हैं।
दूसरा विरोधाभास राजनीतिक और आर्थिक पद्धतियों के बीच है। राजनीति में समानता है तो आर्थिक पद्धति में असमानता है। एक व्यक्ति का एक मत, एक मत का एक मूल्य हमारा राजनीतिक आदर्श वाक्य है। हमारी आर्थिक पद्धति का आदर्श-वाक्य हमारे राजनीतिक आदर्श वाक्य का प्रतिवाद है। इन विरोधों के समाधान के लिए अलग-अलग मत हो सकते हैं, परंतु इस बात में मत की कोई भिन्नता नहीं है कि ये विरोधी तत्व विद्यमान हैं।