पूर्ण श्रम सम्मेलन का प्रथम सत्र
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यह सच है कि यद्यपि ये विरोधी तत्व सुस्पष्ट हैं, फिर भी अधिकतर जनता इन्हें नहीं देख पाती। परंतु आज परिस्थिति बदल चुकी है और इनमें सबसे तीव्र विरोधाभास जो दिखाई नहीं देता था वह अब सबसे मंद बुद्धि वाले व्यक्ति को भी नजर आने लगा है।
दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूं वह यह है। जब से सामाजिक जीवन का आधार प्रतिष्ठा से बदलकर विरोधाभास पर आ पहुंचा है तब से यह सामाजिक सुरक्षा उत्पन्न हुई है और इसके निराकरण में उन सभी व्यक्तियों का चिंतन लगा हुआ है जो मानव-जीवन की श्रेष्ठता में विश्वास करते हैं। मानव अधिकारों तथा स्वतंत्रता के उन विभिन्न तरीकों के समझाने में पर्याप्त शक्ति लग गई है जो उसका अनन्य जन्मसिद्ध अधिकार समझा जाना चाहिए। जो भी हो, यह सब बहुत अच्छा है, बहुत आशाजनक है। मैं यह कहना चाहता हूं कि तब तक बहुत कम सुरक्षा होगी जब तक कि प्रशांत महासागर के देशों के संबंधों के सम्मेलन के आर्थिक ग्रुप की रिपोर्ट के शब्दों का उपयोग नहीं किया जाता। इन अधिकारों को ऐसी सरल भाषा में अभिव्यक्त किया जाना चाहिए जिसे आम जनता समझ सके अर्थात शांति, एक घर, पर्याप्त वस्त्र, शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य और बीमा किसी भय के विश्व के चौड़े राजमार्गों में प्रतिष्ठा के साथ चलने का अधिकार।
प्रतिष्ठित अस्तित्व के लिए
हम भारतवासी इन समस्याओं को पहचानने में असफल नहीं हो सकते अथवा उनकी ओर से मुंह नहीं मोड़ सकते। हमें इन मूल्यों के पुनर्मूल्यांकन के लिए तैयार रहा चाहिए। हमारे लिए यह पर्याप्त नहीं होगा कि हम भारत में औद्योगिक विकास को अपना लक्ष्य बनाएं। हमें इस बात पर सहमत होना होगा कि इस प्रकार का औद्योगिक विकास वांछनीय सामाजिक स्तर पर बनाए रखें। केवल यह पर्याप्त नहीं होगा कि हम अपनी शक्ति को भारत में अधिक संपत्ति जोड़ने में लगाएं। हमें सभी भारतीयों के उस आधारभूत अधिकार को ही मान्यता देने पर सहमत होना होगा कि उस संपत्ति को न केवल सुकर और प्रतिष्ठित अस्तित्व का साधन माना जाए अपितु असुरक्षा से बचने के लिए भ्ी उसको सुनिश्चित करने का आधार बनाना होगा। इससे पूर्व कि मैं अपने भाषण को समाप्त करूं, एक ऐसा मामला है जिसके बारे में मैं कुछ कहना चाहूंगा। हमारी बैठकों में कभी-कभी असंबद्ध और अव्यावहारिक बातें हो जाती हैं।
मेरा ऐसा कोई विचार नहीं है कि इस मामले में अधिक आलोचना करूं, परंतु मैं प्रतिनिधियों से यह कहना चाहूंगा कि वे यथासंभव अपनी बात संक्षेप में कहें और विषय तक ही सीमित रहें। मैं यह नहीं चाहता कि कोई भी प्रतिनिधि चर्चा में भाग