18. मजदूर और संसदीय लोकतंत्रा - Page 120

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ऽमजदूर और संसदीय लोकतंत्र

(इंडियन फैडरेशन ऑफ लेबर के तत्वावधीन में 8 से 17 सितम्बर, 1943 तक दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कार्मिक संघ के कार्यकर्ताओं के अध्ययन शिविर के समापन सत्र में दिया गया भाषाण)

मैं आपके सचिव का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे आज संध्या-समय यहां आने और भाषण देने के लिए आमंत्रित किया है। मैं इस निमंत्रण को स्वीकार करने में झिझक रहा था जिसके दो कारण थे। पहली बात तो यह कि मैं शायद ही कोई ऐसी बात कह सकता हूं जिससे सरकार बंध जाए। दूसरे, मैं मजदूर संघ के बारे में भी जिसमें आप मुख्य रूप से रुचि रखते हैं, बहुत कम कह सकूंगा। मैंने इस निमंत्रण को इसलिए स्वीकार किया है कि आपके सचिव किसी प्रकार भी मेरी ‘ना’ स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। मैंने भी यह महसूस किया कि शायद मेरे लिए यह सर्वोत्तम अवसर है जब मैं भारत के श्रम संगठन पर अपने विचार व्यक्त कर सकूंगा जो मेरे मन में सर्वोपरि स्थान बनाए हुए हैं और जिसके बारे में मैंने सोचा कि वे लोग भी दिलचस्पी ले सकते हैं जो मुख्य रूप से मजदूर-संघवाद में रुचि रखते हैं।

मानव समाज की सरकार कुछ बहुत अहम परिवर्तनों से गुजरी है। एक ऐसा भी समय था जब मानव समाज की सरकार के निरंकुश शासक तानाशाही शासन चलाते थे। यह सरकार एक लंबे और खूनी संघर्ष द्वारा संसदीय लोकतंत्र के नाम से प्रसिद्ध शासन पद्धति में बदल गई। यह महसूस किया गया कि यह शासन पद्धति सर्वश्रेष्ठ है। यह विश्वास किया गया कि यह एक ऐसा स्वर्णिम युग लाएगी जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता, संपत्ति और खुशहाली का अधिकार प्राप्त होगा। इन आशाओं का अच्छा आधार भी था। संसदीय लोकतंत्र में विधायिका होती है जो जनता की आवाज अभिव्यक्त करती है_ कार्यकारिणी भी होती है जो विधायिका के अधीन

ऽ इंडियन फ्रेडरेशन ऑफ लेबर, 30 फैज बाजार दिल्ली द्वारा प्रकाशित भाषण। बंबई के श्री आर. टी. शिंदे

द्वारा सौंपी गई प्रति।