96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
होती है और उसे विधायिका की आज्ञा का पालन करना होता है। विधायिका और कार्यकारिणी के ऊपर न्यायपालिका का अधिकार होता है और न्यायपालिका इन दोनों को निर्धारित सीमाओं में बांधे रखती है। संसदीय लोकतंत्र में लोकप्रिय सरकार के सभी चिह्न होते हैं। इस प्रकार की सरकार लोगों की, लोगों द्वारा और लोगों के लिए होती है। इसलिए यह आश्चर्य की बात है कि संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध हुआ है यद्यपि एक शताब्दी भी नहीं बीती है जबकि इसकी व्यापक रूप से स्वीकृति हुई। इस पद्धति के विरुद्ध इटली, जर्मनी, रूस और स्पेन में विद्रोह हुआ है, और कुछ ही ऐसे देश हैं जहां संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध असंतोष नहीं है। संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध इस बेचैनी और असंतोष का क्या कारण है? यह प्रश्न विचार करने योग्य है। कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां इस प्रश्न पर विचार करने की तात्कालिकता भारत से अधिक हो। भारत संसदीय लोकतंत्र की स्थापना के बारे में बातचीत कर रहा है। किसी ऐसे व्यक्ति की बहुत आवश्यकता है जिसमें भारतीयों से यह कहने के लिए पर्याप्त साहस हो कि, ‘‘संसदीय लोकतंत्र से बचिए। यह सर्वोत्तम पद्धति नहीं है जैसा कि वह दिखाई देती है।’’
संसदीय लोकतंत्र क्यों असफल हुआ? तानाशाहों के देश में यह पद्धति असफल हुई क्योंकि यह ऐसी व्यवस्था है जिसकी गति बहुत धीमी है। यह पद्धति तीव्र कार्रवाई में विलंब करती है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यकारिणी को उस विधायिका द्वारा रोका जा सकता है जो उन कानूनों को पारित करने के लिए इन्कार करे जिन्हें कार्यकारिणी चाहती है, और यदि विधायिका इन कानूनों को पारित करने में देर न करे तो न्यायपालिका ऐसे कानूनों को अवैध घोषित कर देर कर सकती है। संसदीय लोकतंत्र तानाशाही को खुली छूट नहीं देता। इसीलिए, इटली, स्पेन और जर्मनी जैसे देशों में लोकतंत्रीय पद्धति की अवहेलना की जाती है जहां तानाशाहों का शासन है। यदि केवल तानाशाह ही संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध होते तो कोई अंतर नहीं पड़ता। संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध उनकी शहादत कोई माने नहीं रखती। वास्तव में संसदीय लोकतंत्र का इस कारण स्वागत किया जा सकता है कि वह तानाशाही पर प्रभावकारी नियंत्रण रख सकती है। परंतु, दुर्भाग्यवश, उन देशों में भी संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध भारी असंतोष है जहां लोग तानाशाही के विरोधी हैं। यह संसदीय लोकतंत्र के बारे में सबसे
खेदनजक तथ्य है। इससे भी अधिक खेदजनक यह है कि संसदीय लोकतंत्र कहीं थमा नहीं है। इसने तीन दिशाओं में प्रगति की है। राजनीतिक अधिकारों की समता की धारणा के विस्तार द्वारा इसकी प्रगति हुई है। संसदीय लोकतंत्र वाले ऐसे बहुत कम देश हैं जहां वयस्क मतदान हो। इस पद्धति ने सामाजिक समता और आर्थिक अवसर के सिद्धांत को स्वीकार किया है और तीसरे इसकी मान्यता यह है कि जो