मजदूर और संसदीय लोकतंत्र
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संस्थाएं अपने उद्देश्य में समाज-विरोधी हैं वे राज्य की अवहेलना नहीं कर सकती। किन्तु यह सब कुछ होते हुए भी, उन देशों में संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध भारी बेचैनी है जो लोकतंत्र के प्रति वचनबद्ध हैं। ऐसे देशों में असंतोष के कारण स्पष्टता वे उन देशों से अलग हैं जो तानाशाही देश कहलाते हैं। इसमें विस्तार से जाने का समय नहीं है। परंतु सामान्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि संसदीय लोकतंत्र के प्रति असंतोष इस अनुभव के कारण है कि यह आम जनता के लिए स्वतंत्रता, संपत्ति अथवा खुशहाली के अधिकार के आश्वासन के प्रति असफल रहा है। यदि यह सच है, तो उन कारणों को जानना महत्वपूर्ण है जिनके फलस्वरूप यह असफलता प्राप्त हुई है। इस असफलता के मूल में गलत विचारधारा अथवा गलत संगठन अथवा दोनों ही हो सकते हैं। मेरे विचार से दोनों में ही ये कारण खोजे जा सकते हैं। संसदीय लोकतंत्र को दूषित करने वाली विचारधारा के बारे में मैं केवल दो बातें कह सकता हूं। मुझे इस बात में संदेह नहीं है कि संसदीय लोकतंत्र को नष्ट करने वाली चीज है करार की स्वतंत्रता का विचार। इस विचार को बड़ा पुनीत माना गया और इसे स्वतंत्रता के नाम पर स्वीकार किया गया। संसदीय लोकतंत्र ने आर्थिक असमानताओं की ओर ध्यान नहीं दिया और इस बात पर विचार नहीं किया कि करार करने वाले पक्षों की स्वतंत्रता के परिणाम क्या निकलेंगे, यदि वे पक्ष असमान हों। इसने इस बात की परवाह नहीं की कि करार की स्वतंत्रता ने सशक्त को यह अवसर दिया कि वह कमजोर को धोखा दे सकता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि संसदीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता की अग्रणी हिमायती होते हुए गरीबों, दलितों और वंचितों की आर्थिक विषमताओं को और बढ़ाया है। दूसरी गलत विचारधारा जिसने संसदीय लोकतंत्र को दूषित किया है, यह समझ पाने की असफलता जहां कोई भी सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र न हो वहां राजनीतिक लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता। इस उक्ति पर कोई भी प्रश्न उठा सकता है। ऐसे लोगों से जो इसके बारे में प्रश्न उठाते हैं मैं एक प्रति प्रश्न करना चाहूंगा। इटली, जर्मनी और रूस जैसे देशों में संसदीय लोकतंत्र इतनी सरलता से क्यों असफल हो गया? यह पद्धति इंग्लैंड और अमरीका में इतनी सरलता से भंग क्यों नहीं हुई? मेरे विचार से इसका केवल एक उत्तर है - अर्थात इन दोनों देशों में पहले बताए गए देशों की अपेक्षा अधिक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र है। सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र राजनीतिक लोकतंत्र के स्नायु और तंत्र हैं। ये स्नायु और तंत्र जितने अधिक मजबूत होते हैं, उतना ही शरीर सशक्त होता है। लोकतंत्र समानता का दूसरा नाम है। संसदीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता की चाह का विकास किया, परंतु समानता के प्रति इसने नकारात्मक रुख अपनाया। यह समानता के महत्व के अनुभव करने में असफल रहा और इसने स्वतंत्रता तथा समानता के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रयास नहीं किया जिसका परिणाम यह हुआ कि स्वतंत्रता ने