18. मजदूर और संसदीय लोकतंत्रा - Page 123

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

समानता को निगल लिया तथा असमानता को पनपने दिया।

मैंने उन गलत विचारधाराओं का उल्लेख किया जो मेरे विचार से संसदीय लोकतंत्र की असफलता के लिए उत्तरदायी हैं। परंतु मुझे इस बात का यकीन है कि गलत विचारधारा से भी अधिक लोकतंत्र का त्रुटिपूर्ण संगठन इसकी असफलता के लिए उत्तरदायी है। सभी राजनीतिक समाज दो वर्गों में विभाजित होते हैं - शासक और शासित। यह एक अनिष्टकर बात है। यदि यह बात यहीं रुक जाती तो अधिक तूल न पकड़ती। परंतु दुर्भाय की बात यह है कि यह विभाजन इतना दकियानूसी और संतुष्टिदायक बन जाता है कि शासक सदैव शासक वर्ग के होते हैं और शासित वर्ग कभी भी शासक वर्ग नहीं बन सकता। लोक स्वयं को शासित नहीं करते अपितु वे एक सरकार की स्थापना करते हैं और उस सरकार को स्वयं पर शासन करने के लिए मुक्त छोड़ देते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि यह सरकार उनकी नहीं है। यह स्थिति होने के कारण संसदीय लोकतंत्र की कभी भी ऐसी सरकार नहीं बन पाई जो लोगों की हो अथवा लोगों द्वारा हो, और यही कारण है कि यह सरकार कभी भी लोगों के लिए नहीं बनी। संसदीय लोकतंत्र लोकप्रिय सरकार का ताना-बाना होते हुए भी वास्तव में एक वंशानुगत शासक वर्ग द्वारा वंशानुगत प्रजा वर्ग की सरकार है। यही उस राजनीतिक जीवन का अनिष्ठकारी संगठन है जिसने संसदीय लोकतंत्र को बिल्कुल असफल बनाया है। यही कारण है कि संसदीय लोकतंत्र ने उस आशा की पूर्ति नहीं की जिसे उसने मानव की स्वतंत्रता, संपत्ति और खुशहाली को सुनिश्चित करने के लिए जनसाधारण तक पहुंचाया था।

प्रश्न यह है कि इसके लिए उत्तरदायी कौन है? इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि संसदीय लोकतंत्र गरीब मजदूर और दलित वर्गों को लाभ पहुंचाने में असफल हुआ है, तो यहीं वे वर्ग हैं जो मुख्यतया इस स्थिति के उत्तरदायी हैं। सर्वप्रथम, इन वर्गों ने मानव जीवन में आर्थिक तत्व के प्रभाव क प्रति निपट उदासीनता दिखलाई है। हाल ही में किसी ने ‘‘एंड आफ द इकानॉमिक मैन (आर्थिक व्यक्ति का अंत)’’ नामक पुस्तक लिखी है। हम वास्तव में ‘एंड ऑफ द इकानॉमिक मैन’ की चर्चा नहीं कर सकते जिसका आम कारण यह है कि आर्थिक व्यक्ति कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ। मार्क्स के विरुद्ध यह कही जाने वाली बात है कि मनुष्य केवल रोटी के सहारे ही जीवित नहीं रहता, दुर्भाग्यवश सच है। मैं कारलाइल के इस विचार से सहमत हूं कि सभ्यता का उद्देश्य यह नहीं है कि मनुष्य केवल मोटा बनाया जाए जैसा कि हम सुअरों को बनाते रहते हैं हम उस स्थिति से बहुत दूर हैं। सुअरों के समान मोटा होना तो दूर, श्रमिक वर्ग भूखा मर रहा है और हम चाहते हैं कि उनके लिए सर्वप्रथम रोटी की व्यवस्था की जाए और बाद में किन्हीं अन्य वस्तुओं की।