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मजदूर और संसदीय लोकतंत्र

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मार्क्स ने इतिहास का आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसकी वैधता के बारे में भारी मतभेद उभरा। मेरे विचार से मार्क्स ने इसे सिद्धांत के रूप में नहीं वरन् श्रमिकों को दिशा दिखाने के रूप में प्रतिपादित किया था कि यदि श्रमिक वर्ग अपने आर्थिक हितों को सर्वापरि महत्व दे, जैसाकि स्वामी-वर्ग अपने हितों को देता है, तो इतिहास जीवन के आर्थिक पहलुओं को पहले से बेहतर तरीके से उजागर करेगा। यदि इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धांत पूर्णतया सत्य नहीं है, तो इसका कारण यह है कि कुल मिलाकर श्रमिक वर्ग आर्थिक तथ्यों को वह आवश्यक शक्ति देने में असफल हुआ है जो वह सहयोगी जीवन को दिशा के रूप में उसे प्रदान करती है। श्रमिक वर्ग मानवता की सरकार से संबंधित साहित्य से अपने को अवगत कराने में असफल हुआ है। श्रमिक वर्गों के प्रत्येक व्यक्ति को श्रमिकों की परिस्थितियों के बारे में रूशो के सोशल कांट्रेक्ट, मार्क्स के कम्युनिस्ट मैनीफैस्टों और पोप लियो XIII के एनसाइक्लिकल के विचारों और जान स्टुअर्ट मिल के स्वतंत्रता के विचारों से अवगत होना चाहिए। आधुनिक समय के सामाजिक और सरकारी संगठन के आधारभूत कार्यक्रम दस्तावेजों में से मैंने केवल चार का उल्लेख किया है, परंतु श्रमिक वर्ग इन पर उतना ध्यान नहीं देगा जितनी आवश्यकता है। इसके विपरीत श्रमिकों को प्राचीन सम्राटों और महारानियों की असत्य और कल्पित कहानियों के पढ़ने में आनंद आता है और वे इस प्रकार का साहित्य पढ़ने के आदी हो गए हैं।

एक अन्य और बड़ा अपराध है जो उन्होंने स्वयं अपने विरुद्ध किया है। उन्होंने सरकार में अपना वर्चस्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा विकसित नहीं की है, और वे इस बात की आवश्यकता नहीं समझते कि उनके हितों की रक्षा के लिए सरकार पर उनका नियंत्रण होना चाहिए, यहां तक कि सरकार में उनकी कोई दिलचस्पी ही नहीं है। उन तमाम त्रासदियों में जिन्होंने मानवता को उथल-पुथल किया है, यह सबसे बड़ी त्रासदी है। कोई भी संगठन हो उसने मजदूर संघ का स्वरूप धारण कर लिया है। मैं मजदूर संघों का विरोधी नहीं हूं। उनसे बहुत उपयोगी उद्देश्य की पूर्ति होती है। परंतु यह मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी कि मजदूर संघ श्रमिकों की सभी व्याधियों के लिए रामबाण है। मजदूर संघ कितने ही सशक्त क्यों न हों, फिर भी ये इतने शक्तिशाली नहीं होते कि पूंजीवादियों को पूंजीवाद सही प्रकार चलाने को बाध्य कर सकें। मजदूर संघ तभी अधिक प्रभावकारी होंगे जब उनके पीछे श्रमिकों की एक विश्वसनीय सरकार हो। श्रमिकों का यह उद्देश्य होना चाहिए कि वे सरकार पर नियंत्रण करना अपना लक्ष्य बनाएं। जब तक कि मजदूर संघवाद का उद्देश्य सरकार के नियंत्रण का नहीं होता, तब तक मजदूर संघ कामगारों को बहुत कम लाभ पहुंचा सकेंगे और मजदूर संघ नेताओं के बीच अनवरत तकरार का स्रोत बने रहेंगे।