18. मजदूर और संसदीय लोकतंत्रा - Page 125

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्रमिक वर्गों का तीसरा दुर्बलकारी पाप यह है कि वे उस सरल मार्ग को अपनाते हैं जो उन्हें राष्ट्रीयता की अपील द्वारा भ्रमित कर देता है। श्रमिक वर्ग प्रत्येक दशा में कंगाल है और उसके पास देने के लिए नाम मात्र का धन है, परंतु वह प्रायः तथाकथित राष्ट्रीयता के उद्देश्य के लिए अपना सभी कुछ बलिदान कर देता है। श्रमिक वर्गों ने भी यह जानने की चिंता नहीं की कि जिस राष्ट्रीयता के लिए वे बलिदान कर रहे हैं तो क्या यह राष्ट्रीयता स्थापित होने के पश्चात, उन्हें सामाजिक और आर्थिक समता प्रदान करेगी। अधिकतर मामलों में, स्वतंत्र राष्ट्रीय देश जिसका उद्भव सफल राष्ट्रवाद से हुआ है और जो श्रमिकों के बलिदानों से पोषित हुआ है, अपने सत्ताधारी स्वामियों के अंतर्गत सर्वहारा वर्ग का शत्रु बन जाता है। यह शोषण की सबसे खराब स्थिति है जो श्रमिकों ने स्वयं ही अपने ऊपर अधिरोपित कर ली है।

यदि श्रमिक वर्ग को संसदीय लोकतंत्र पद्धति के अंतर्गत रहना है तो उसे यथासंभव सर्वोत्तम साधन तैयार करने चाहिए जिनके द्वारा उस पद्धति को वह अपने लाभ-कार्यों में प्रयुक्त कर सके। जहां तक मैं समझता हूं, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए दो बातें आवश्यक हैं। पहली बात यह है कि मजदूर संघों की मात्र स्थापना को भारत के श्रमिकों के अंतिम उद्देश्य और प्रयोजन की दृष्टि से नकारा जाए। इसे यह घोषणा कर देनी चाहिए कि इसका उद्देश्य श्रमिकों की सरकार बनाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसे एक राजनीतिक श्रम पार्टी संगठित करनी चाहिए। ऐसी पार्टी में मजदूर संघ तो निश्चित रूप से होंगे ही, परंतु इसे संघवाद के संकीर्ण और निरुद्ध करने वाले दृष्टिकोण से, अंतिम लाभ के स्थान पर तात्कालिक लाभ पर जोर देने से और श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने में मजदूर संघ के कार्यकर्ताओं के निहित स्वार्थ से मुक्त रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही इसे सांप्रदायिक अथवा पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों तथा हिंदू महासभा अथवा कांग्रेस से अलग किया जाना चाहिए। श्रमिकों के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे कांग्रेस अथवा हिंदू सहासभा अथवा इनमें से किसी शिविर के महज इसलिए अनुयायी बनें कि वे संस्थाएं भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का दावा करती हैं। श्रमिक अपने ही प्रकार के अलग राजनीतिक संगठन द्वारा इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति कर सकते हैं। श्रमिक कांग्रेस और हिंदू महासभा दोनों के ही चुंगल से मुक्त होकर भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई अधिक अच्छे ढंग से लड़ सकते हैं। श्रम संगठन राष्ट्रवाद के नाम पर धोखा खाने से अपने आपको रोक सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रम संगठन भारतीय राजनीति की अविवेकता के विरुद्ध सशक्त अवरोध के रूप में कार्य कर सकता है। कांग्रेस राजनीति का दावा है कि वह क्रांतिकारी है। यही कारण है कि इसके अनेक अनुयायी बन गए हैं। परंतु यह भी सत्य है कि कांग्रेस राजनीति ने कुछ भी प्राप्त नहीं किया