18. मजदूर और संसदीय लोकतंत्रा - Page 126

मजदूर और संसदीय लोकतंत्र

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है, अपितु नैराश्य ही उत्पन्न किया है। इसका कारण यह है कि कांग्रेस की राजनीति अत्यधिक अविवेकी है और इस अविवेक का सबसे बड़ा कारण यह है कि कांग्रेस का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। भारत के श्रमिकों की एक पार्टी इस अविवेक को दूर करने के लिए, जिसने गत दो दशकों में भारतीय राजनीति पर अपना आधिपत्य जमा लिया है, सबसे अधिक कारगर सिद्ध होगी। दूसरी बात यह है कि भारत के श्रमिकों को यह अनुभव करना है कि ज्ञान के बिना शक्ति नहीं आती। जब श्रमिकों की कोई पाटी भारत में बनाई जाए और जब यह पार्टी चुनाव से पूर्व गद्दी पर बैठने का अपना दावा करे तो प्रश्न यह उठेगा कि क्या श्रमिकों की पार्टी शासन करने योग्य है? यह उत्तर देना ठीक नहीं होगा कि श्रमिक अन्य वर्गों की तुलना में देश अथवा विदेश के मामलों में कम कुशलता अथवा दिवालियापन नहीं दिखाएंगे। श्रमिकों को ठोस तरीके से यह सिद्ध करना होगा कि वे अधिक कुशलता से शासन कर सकते हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि श्रमिकों की सरकार का स्वरूप अन्य वर्गों की अपेक्षा अधिक कठिन है। श्रमिकों की सरकार ‘अहस्तक्षेप नीति’ की सरकार नहीं बन सकती। यह ऐसी सरकार होगी जो वस्तुतः नियंत्रण की पद्धति पर आधारित होगी। नियंत्रण की पद्धति में ‘अहस्तक्षेप नीति’ की सरकार की अपेक्षा अधिक ज्ञान और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। दुर्भाग्यवश भारत के श्रमिकों ने अध्ययन के महत्व को नहीं समझा है। भारत के श्रमिकों के नेताओं ने यह सीखा है कि उद्योगपतियों को किस प्रकार बुरा-भला कहा जाए। श्रमिकों के नेताओं की अंततोगत्वा भूमिका यह रही है कि उन सबको अधिक से अधिक बुरा-भला कहें।

इसलिए मुझे बड़ी प्रसन्न्ता है कि इंडियन फेडरेशन आफ लेबर ने यह कमी पहचान ली है और श्रमिकों के वर्गों के लिए अध्ययन की व्यवस्था है जिससे श्रमिक शासन करने योग्य बन जाएंगे। मुझे आशा है कि फेडरेशन अन्य आवश्यकता यथा श्रमिकों की पार्टी के उद्घाटन को नहीं भूलेगी। जब यह कार्य सम्पन्न हो जाए तो फेडरेशन धन्यवाद की पात्र होगी कि उसने श्रमिक वर्ग की प्रतिष्ठा दिलाने के लिए उन्हें उच्च स्थान पर बिठाया।