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भारत में विद्युत शक्ति का युद्धोत्तर विकास

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साहसी मित्र और साथी माननीय श्री जे. पी. श्रीवास्तव थे। परिषद की पुनर्निर्माण समिति ने पांच अलग-अलग पुनर्निर्माण समितियां स्थापित की हैं। समिति संख्या 1 का संबंध पुनर्बंदोबस्त और पुनर्रोजगार से है समिति संख्या 2 निपटान, ठेके और सरकारी खरीदों के बारे में काम करती है। समिति संख्या 3 का काम तीन समितियों में विभाजन हैः समिति संख्या 3(क) परिवहन से_ समिति संख्या 3(ख) डाक-तार और वायु-संचार से_ और समिति संख्या 3(ग) लोक-निर्माण और विद्युत शक्ति से संबंधित हैं। समिति संख्या 4 का संबंध व्यापार और उद्योग से है और समिति संख्या 5 का संबंध कृषि से है।

इन समितियों में से प्रत्येक समिति की एक नीति-समिति है जो परिषद के सदस्य की अध्यक्षता में कार्य करती है और जिसमें केंद्र सरकार, प्रांतीय सरकारों, रियासतों की सरकारों, तथा व्यापार, उद्योग और वाण्ज्यि के आवश्यक समझे जाने वाले प्रतिनिधि शामिल हैं। प्रत्येक समिति की एक सरकारी समिति भी होती है जो विभाग के सचिव की अध्यक्षता में कार्य करती है तथा इस समिति में अन्य संबधित विभागों के सचिव भी होते हैं।

इस प्रकार की दो समितियों के अलावा कुछ पुनर्निर्माण समितियों के पास एक तीसरी समिति होती है जो विषय समिति कहलाती हैं जो अपने क्षेत्र में उठने वाले तकनीकी विषयों को देखती है। इन समितियों के अलावा, सामाजिक सेवाओं की एक सरकारी समिति और अर्थशास्त्रियों की एक परामर्शदात्री समिति होती है। इस प्रकार की कार्य योजना केंद्रीय सरकार द्वारा पुनर्निर्माण की समस्याओं का निराकरण करने के लिए की गई है। हमारी यह बैठक पुनर्निर्माण समिति संख्या 3(ग) की नीति समिति से है। इस समिति का कार्य विद्युत शक्ति से संबंधित समस्याओं का अध्ययन करना तथा यह सिफारिश करना है कि इन समस्याओं को सुलझाने का सर्वोत्तम उपाय क्या हो सकता है।

इन समस्याओं का विश्लेषण करने से पूर्व मैं इस प्रश्न का उल्लेख करना चाहता हूं जिसका संबंध विद्युत शक्ति के उत्पादन से है और जिसके बारे में मैं प्रारंभ में ही कुछ कहना चाहूंगा ताकि यह हमारे रास्ते से हट जाए। इसका संबंध उन मशीनों, औजारों और संयंत्रों को मंगाने से है जिनकी आवश्यकता विद्युत शक्ति के उत्पादन में होगी। इस मशीनरी को विदेश से प्राप्त करना होगा, अधिकांश को ग्रेट ब्रिटेन से। ऐसी मशीनरी को प्राप्त करने में कठिनाइयां आने की संभावनाएं हैं। ग्रेट ब्रिटेन को भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी बहुत सी उत्पादन क्षमता को आरक्षित करना है।

कुछ अन्य यूरोपीय और एशियाई देश भी हैं जिन्हें ब्रिटिश और अमरीकी बाजारों से आवश्यक औजारों और संयंत्रों की खरीद करेंगे। इस प्रतियोगिता में भारत के लिए