112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपनी आवश्यकता की मात्रा का पर्याप्त सामाना प्राप्त कर पाना कठिन होगा। भारत की स्थिति की सुरक्षा के लिए यह वांछनीय होगा कि भारत औजारों और संयंत्रों के लिए अपने आर्डर यथासंभव शीघ्र दे दे और अधिक से अधिक सामान जो लिया जा सकता है ले। प्राथमिकता के बारे में अधिक कठिनाइयां नहीं हो सकतीं। मैं इस बात से पर्याप्त रूप से आश्वस्त हूं कि हम महामहिम की सरकार का भरोसा कर सकते हैं और भारत के लिए उच्च प्राथमिकता उस सेवा के बदले में मांग सकते हैं जो हमने युद्ध के दौरान की थी। परंतु अन्य कठिनाइयां हैं जो मुख्यतया इंडेट तैयार करने तथा पक्के आर्डर के रूप में उन्हें निर्माताओं को भेजना है।
सर्वप्रथम, विद्युत विशुद्ध रूप से प्रांतीय विषय है। अतः औजारों और मशीनरी का तखमीना प्रांतों से प्राप्त करना होगा। केंद्र उन्हें समेकित कर सकता है।
दूसरे, मशीनरी का प्रकार इस बात पर निर्भर होगा कि विद्युत के उत्पादन का आधार कहां क्या है, जैसे जल, भाप, तेल आदि।
तीसरी कठिनाई उन सरकारों की प्रवृत्ति की अनिश्चितता से उत्पन्न होती है जो युद्ध के बाद अस्तित्व में आएंगी। क्या भावी सरकारें वर्तमान सरकार की योजनाओं को स्वीकार करेंगी? क्या भावी सरकारें वर्तमान सरकार का वही कराधान स्तर बनाए रखेंगी जो इन योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है? इन प्रश्नों के बारे में कोई भी व्यक्ति आश्वस्त नहीं हो सकता। परंतु साथ ही यह विडम्बना भी है कि यह सरकार अपने कर्तव्य में असफल होगी यदि इसने भारत की समृद्धि के लिए युद्ध समाप्ति पर विद्युतिकरण की दिशा में आवश्यक उपकरण और संयंत्र प्राप्त नहीं किए।
नीति-समिति के कृत्य
मैं इस मामले को तात्कालिक और महत्वपूर्ण मानता हूं। परंतु मुझे विश्वास है कि आप मानेंगे कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसका संबंध मुख्यतया इस समिति से हो। यह नीति-समिति है और हमारा मुख्य कार्य है कि हम बिजली के प्रशासन, उत्पादन और वितरण से उभरी समस्याओं का निराकरण करें तथा यह सिफारिश करें कि ऐसे कौन से सिद्धांत हैं जो भावी भारत सरकार का मार्गदर्शन कर सकते हैं। हमने आज अपनी नीति-समिति की बैठक का लाभ उठाया है और प्रांतीय सरकारों तथा रियासतों की सरकारों से कहा है कि वे इस बैठक में अपने प्रतिनिधि भेजें ताकि उनके विचारों का लाभ उठाया जा सके।
बिजली का विषय सार्वजनिक है और इसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। भारत सरकार पहली बार 1905 में इससे अवगत हुई और उस समय उसने प्रांतीय सरकारों को एक परिपत्र भेजा। इसके बाद प्रांतीय सरकारें और केंद्रीय सरकार दोनों ही इस