20. भारत में विद्युत शक्ति का युद्धोत्तर विकास - Page 141

116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि सस्ती और प्रचुर मात्रा में बिजली के बिना भारत में औद्योगिकीकरण का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। यह उत्तर इस समिति के उस कार्य के महत्व का केवल एक भाग है जो इस समिति को सम्पन्न करना है।

दूसरा प्रश्न आप यह पूछिए कि ‘‘औद्योगिकीकरण क्यों आवयक हैं?’’और आपके समक्ष शीघ्र ही उसका महत्व स्पष्ट हो जाएगा क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर है कि भारत में गरीबी के अनवरत चक्र से लोगों को बचाने का सबसे विश्वसनीय उपाय औद्योगिकीकरण है। चूंकि भारत के अधिकांश लोग गरीबी की चपेट में हैं, अतः भारत में औद्योगिकीकरण को शीघ्र ही प्रारंभ किया जाना चाहिए।

भारत का औद्योगिकीकरण

भारत में औद्योगिकीकरण वर्षों से केवल बहस का मुद्दा बना रहा परंतु कोई भी इसमें सफल नहीं हुआ कि औद्योगिकीकरण के बारे में गंभीर अभियान चलाया जाए। अभी भी कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जो केवल दिखावटी प्रेम रखते हैं। अन्य कुछ व्यक्ति ऐसे है जो इसे सनक नहीं तो झक्कीपन समझते हैं। अधिकांश लोग ऐसे हैं जो यह उपदेश देते नहीं थकते कि भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए हमें अपनी समस्त शक्ति कृषि सुधार में लगानी चाहिए और औद्योगिकीकरण के पीछे नहीं भागना चाहिए। किसी को यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि भारत मुख्यतया एक कृषि प्रधान देश है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि कुछ ही लोग यह महसूस कर सके हैं कि यह कितना बड़ा दुर्भाग्य है। मैं यह जानता हूं कि इस बात को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा। क्या यह सिद्ध करने के लिए कि यह दुर्भिक्ष से भी कहीं बड़ा दुर्भाग्य है, उस दुर्भिक्ष से भी बड़ा साक्ष्य चाहिए जो बंगाल और भारत के अन्य भागों में लुक-छिपकर शिकार कर रहा है और जहां कृषि में लगे अनेक व्यक्ति खाद्यान्न अथवा क्रय शक्ति के अभाव में प्रतिदिन मर रहे हैं?

मेरे विचार से यह दर्शाने के लिए कि भारत में कृषि असफल हो गई है और नितांत असफल हो गई है इस बड़े प्रमाण की आवश्यकता नहीं हो सकती कि भारत

खाद्यान्न के अलावा किसी अन्य उत्पादन में नहीं लगा हुआ है और फिर भी वह इतना पर्याप्त अनाज पैदा नहीं कर पाता कि अपने लोगों का पेट भर सके। इसका क्या कारण हैं? मेरे विचार से भारत की गरीबी का मूल आधार यह है कि भारत कृषि पर निर्भर करता है।

भारत में जनसंख्या प्रति दशक बहुत तीव्र गति से बढ़ती चली जा रही है। इस असीमित जनसंख्या वृद्धि की तुलना में भूमि बहुत सीमित है, बल्कि यह सीमित भूमि ऐसी है जिसकी उर्वरता प्रति वर्ष घटती जा रही है। भारत ऐसे दोहरे हमले के बीच में फंस गया है - एक ओर जनसंख्या की प्रगामी वृद्धि है तो दूसरी ओर भूमि की उर्वरता का प्रगामी ह्रास है।