कोयले की खानों में भूमिगत कार्यों में महिलाओं की नियुक्ति पर लगाए गये प्रतिबंध
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इन प्रारंभिक टिप्पणियों के बाद, पहली बात मैं यह कहना चाहूंगा कि कुछ माननीय सदस्यों की बातों से मुझे ऐसा लगा कि भारत सरकार महिलाओं को भूमिगत काम करने से रोकने की प्रथा के संबंध में कभी भी गंभीर नहीं रही यद्यपि भारत सरकार ने वर्ष 1939 में इस बारे में अपनी अनुमति दे दी थी और 4 वर्ष के अंतराल में ही इस अनुमति को वापस ले लिया। मैं इस मामले को सही परिप्रेक्ष्य में सदन के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहूंगा। सदन को याद होगा कि भारत सरकार ने इस प्रथा के अस्तित्व में आने से काफी पूर्व ही, भूमिगत स्थलों में महिलाओं के काम न करने के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था। जहां तक मैंने अध्ययन किया है, इस मामले पर वर्ष 1923 में उस समय चर्चा हुई थी जब भारत सरकार ने भारतीय कोयला खान अधिनियम के संशोधन के लिए एक विधेयक प्रस्तुत किया था। मैं सदन को यह याद दिलाना चाहूंगा कि इस विधेयक का मूल उद्देश्य अत्यंत सीमित था। इसका एकमात्र उद्देश्य कोयले की खानों में सुरक्षा के उपाय प्रारंभ करना था। परंतु जब यह अधिनियम प्रवर समिति के समक्ष लाया गया तो प्रवर समिति ने कहा कि भारत सरकार को इस बारे में आगे बढ़ना चाहिए और ठोस कदम उठाना चाहिए तथा इस अधिनियम में ऐसे अधिकार ग्रहण करने चाहिए जिनके अंतर्गत कामगार महिलाओं को भूमिगत स्थलों मेंं काम करने से रोका जाए। प्रवर समिति में, भारत सरकार ने इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया, भारत सरकार ने इस सिद्धांत को स्वीकार ही नहीं किया, अपितु महिलाओं को भूमिगत स्थलों में काम न दिए जाने के निश्चित उद्देश्य से विनियम भी बनाए। जैसकि सदन को विदित होगा, भारत सरकार ने भूमिगत स्थलों में कार्यरत महिलाओं की वार्षिक संख्या को कम करने के लिए एक निश्चित कार्यक्रम बनाया था। इतना ही नहीं, इस सदन में जब इस बात की स्वीकृत ली गई उसके दो वर्ष पूर्व कोई भी महिला खानों के अंदर काम नहीं कर रही थी। श्रीमन्, इस तथ्य को इस प्रस्ताव की माननीया प्रस्तावक द्वारा उल्लेख किया गया था। परंतु मुझे इससे दुःख हुआ कि उन्होंने इससे यह स्पष्ट परिणाम नहीं निकाला जो मैं समझता हूं कि तर्कसंगत रूप से निकाला जा सकता है कि भारत सरकार ने इस प्रथा के अस्तित्व में आने से बहुत समय पूर्व ही अपना निश्चित मत प्रकट कर दिया था कि महिलाओं को खानों के अंदर काम नहीं करना चाहिए और उसने इस संबंध में ऐसे निश्चित कदम उठाए जिनके द्वारा स्थिति सुधर जाए।
अब भारत सरकार को यह प्रतिबंध उठाने के लिए इस कल्पनात्मक आधार पर दोषी ठहराया गया है कि इसका कोई औचित्य नहीं है। इस प्रकार के आरोप से मुझे बड़ी हैरानी हुई। श्रीमन्, मैं सदन के समक्ष दो विचार-बिंदुओं का उल्लेख करना चाहूंगा और सदन से निवेदन करूंगा कि वह इस तथ्य पर ध्यान दे कि इनमें वह बात निहित हैं जिसे मैं एक आपात् स्थिति समझता हूं। श्रीमन्, भूमिगत स्थलों में महिलाओं के काम पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध को हटाने का सीधा संबंध कोयले से है। यह निर्विवाद तथ्य है। मैं सदन के माननीय सदस्यों से इस बात पर विचार करने