132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का निवेदन करता हूं कि क्या कोयले को प्रत्येक दृष्टि से अति-महत्वपूर्ण पदार्थ नहीं समझा जाना चाहिए? सदन क्या कोयला नागरिकों के लिए उपभोक्ता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पदार्थ नहीं है? मैं इस तथ्य पर बल देना चाहता हूं कि हम ऐसी वस्तु की बात नहीं कर रहे हैं जिसका उपयोग हमारी इच्छा के अनुसार टाला जा सके। यह एक ऐसी वस्तु है जिसके बिना हमारा काम नहीं चलता और मैं निवेदन करूंगा कि यह एक ऐसी वस्तु है जिसे हमें भोजन अथवा किसी अन्य वस्तु से भी पहले अपने पास रखना होगा। यह एक ऐसा विचार-बिंदु है जिस पर कि मैं चाहता हूं सदन ध्यान दे। दूसरा विचार-बिंदु सदन के विचारार्थ यह है कि क्या भारत सरकार के लिए यह संभव होता है कि उस समय तक प्रतीक्षा करे जब तक कि यह स्थिति अपने आप न सुधर जाए। मैं यह अच्छी तरह जानता हूं, जैसाकि अधिकांश माननीय सदस्य जानते हैं, कि आम हालत में कोयले का उत्पादन होता है। यह 1943 में उत्पन्न न किया जा सका हो और 1944 में भी उत्पन्न नहीं किया जा सका हो परंतु 1945 में यह उत्पन्न किया जा सकता था। परंतु सदन से मैं यह प्रश्न पूछना चाहता हूं कि क्या यह ऐसा मामला है जिसमें हम प्रतीक्षा कर सकते हैं? क्या यह ऐसा मामला है जिसमें हम सामान्य रूप से उसे होने दें? श्रीमन्, मैं जोरदर शब्दों में यह कहना चाहूंगा कि यह मामला उन मामलों में से है जो तात्कालिक महत्व के होते हैं और जिनके बारे में शीघ्र कदम उठाने की आवश्यकता होती है और यदि कोई सरकार स्थिति को ठीक करने के लिए शीघ्र कदम नहीं उठाती तो ऐसी सरकार एक निकम्मी सरकार है। इसलिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम एक आपातकाल से जूझ रहे हैं और महिलाओं को भूमिगत स्थलों में काम करने के प्रतिबंध को उठाना कोई निठल्ला या स्वेच्छाकारी कृत्य नहीं है अपितु एक ऐसी कार्रवाई है जो इस मामले में तथ्यों तथा परिस्थितियों को देखते हुए पूरी तरह न्यायसंगत है। इसलिए, श्रीमन्, सरकार के व्यवहार पर आपातकाल के परिप्रेक्ष्य में विचार करना चाहिए।
मैं माननीय सदस्यों से यह निवेदन करना चाहूंगा कि वे इन दोनों परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में सरकार की कार्रवाई के बारे में अपना निर्णय करें। क्या सरकार वह करने में असफल हो गई जो उसे करना चाहिए था? क्या सरकार ने ऐसा कुछ किया जो करने की आवश्यकता नहीं थीं? मेरा निवेदन है कि इस बात पर उन दोनों परिस्थतियों के परिप्रेक्ष्य में निर्णय किया जाना चाहिए जिनका मैंने उल्लेख किया है। अतः मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि सरकार की कार्यवाही पूर्णतया न्यायसंगत है।
मेरे माननीय सदस्य श्री जोशी ने कहा कि यह ऐसी प्रथा थी जिसको तोड़ना नहीं चाहिए था। मैं इस बात पर सहमत हूं कि यह एक ऐसी प्रथा है जिसमें अपने ही स्वागत की प्रणाली निहित नहीं है। परंतु मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि किसी भी देश को यह अधिकार है कि वह कुछ परिस्थितियों में किसी अंतर्राष्ट्रीय