कोयले की खानों में भूमिगत कार्यों में महिलाओं की नियुक्ति पर लगाए गये प्रतिबंध
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परिपाटी या अंतर्राष्ट्रीय करार को तोड़ सकता है। यह अंतर्राष्ट्रीय कानून का एक सुस्थापित सिद्धांत है। मुझे यह कहने में प्रसन्नता है कि जेनेवा में 1940 में शासकीय निकाय में हुई एक बहस में यही आम राय थी। श्रीमन्, क्या हमने जो कदम उठाए उनसे बचा जा सकता था? मैं इस सदन को उन परिस्थितियों का ब्यौरा देना चाहूंगा जिनके कारण सरकार को यह अधिनियम बनाना पड़ा। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि कोयले की कमी के कारण श्रमिकों का अभाव था। यह एक ऐसा तथ्य है जिसके बारे में कोई शंका नहीं है। श्रीमन्, श्रमिकों का अभाव तीन कारणों से हुआ जो सरकार की जांच में सामने आए। सर्वप्रथम, भारत सरकार द्वारा चलाया गया ‘अधिक अन्न उपजाओं’ आंदोलन था। सैन्य कार्यों में अधिक रोजगार के अवसर थे। कोई भी व्यक्ति जो अधिक अन्न उपजाओं आंदोलन के परिणामों तथा सेना में रोजगार के अवसरों की तुलना निष्पक्ष रूप से कोयले की खानों के काम से करेगा तो वह समझ सकेगा कि कोयला खानों में मजदूरों की कमी क्यों हुई। यह स्पष्ट है कि वर्तमान परिस्थितियों में खाद्यान्नों की कीमतें तीव्र गति से बढ़ रही हैं, इसलिए अधिक अन्न उपजाओं नीति से लोगों को ध्यान कृषि की ओर आकर्षित हुआ है। यदि लोग कोयले की खानों में काम कर रहे हैं और, जैसाकि सब जानते हैं, वे विशुद्ध किसान हैं, तो यदि उनका ध्यान अधिक अन्न उपजाओं नीति की ओर आकर्षित किया जाता है तो उस ओर उनका पलायन कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसी प्रकार सैन्य कार्यों से अधिक आय होने के कारण ये लोग उस ओर आकर्षित होते हैं। श्रीमन्, एक और भी ऐसी परिस्थिति है जिसे कुछ माननीय सदस्यों ने बहुत कम महत्व का समझा है, वह एक वास्तविकता है। पहले तो यह बात प्रत्येक व्यक्ति को नितांत स्पष्ट है कि कोयले की खानों में काम करना सबसे प्रतिकूल कार्य है और खतरनाक भी है। इस काम को कोई भी पसंद नहीं करता और यदि किसी भी कामगार को जमीन के नीचे के बजाय ऊपर काम करने का अवसर मिले तो वह जल्द से जल्द खानों के काम को छोड़ने का प्रयत्न करता है। अधिक अन्न उपजाओ आंदोलन और सैन्य कार्य ऐसे कार्य है जो कोयले की खान में काम करने वालों को ऐसा अवसर उपलब्ध कराते हैं जहां कम खतरा होता है और ये कार्य अधिक अनुकूल होते हैं। दूसरी बात जिसे मैं यहां दोहराना चाहूंगा यह है कि अधिक अन्न उपजाओं आंदोलन और सैन्य कार्य दोनों में ही कोयले की खान में काम करने वाले को दोहरा लाभ प्राप्त होता है। एक लाभ यह है कि वह स्वयं कमाता है और दूसरा लाभ यह है कि अपने परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी आय का लाभ उठाता है।
माननीय अध्यक्ष (सर अब्दुर रहीम)ः माननीय सदस्य के पास एक मिनट और है।
माननीय डॉ. वी. आर. अम्बेडकरः श्रीमन्, मुझे खेद है।
माननीय अध्यक्ष (सर अब्दुर रहीम)ः मैं इस मामले में अपने विवेक का प्रयोग नहीं कर सकता। माननीय सदस्य को अपना भाषण समाप्त करना चाहिए।