श्रमिकों के प्रति सरकार की नीति
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मैंने भारत सरकार के उन युद्धकालीन काननों पर विचार किया, जिनसे निस्संदेह श्रमिकों की स्वाधीनता पर असर पड़ा था, तो मैं समझता हूं उससे दो सिद्धांत उभर कर सामने आए। पहला यह है कि भारत सरकार ने पहली बार वह जिम्मेदारी सिर पर ली जो उसने कभी नहीं उठाई थी कि श्रमिकों को नौकरी पर रखने पर कुछ शर्तें लगाई जाएं। मैं सोचता हूं यह बिल्कुल नया सिद्धांत है जो अब तक हमारे श्रम कानूनों में नहीं था और मुझे यकीन है कि युद्धकालीन कानून में शामिल किया गया यह सिद्धांत अब देश के स्थायी श्रम कानून का भाग बन जाएगा।
उस युद्धकालीन कानून में दूसरी बात थी अनिवार्य पंच-फैसला। मान्यवर, मेरा विचार है कि मेरे माननीय मित्र श्री जोशी और श्री जमनादास मेहता मुझे यह कहने की अनुमति देंगे कि मुझे श्रमिकों के विषय में व्यक्तिगत अनुभव है। मैं जनता हूं कि मालिकों से कुछ सुविधाएं प्राप्त करने के लिए श्रमिकों ने हड़तालें कीं और मैं कह सकता हूं कि यह अतिशयोक्ति न होगी कि श्रमिकों ने लंबी, दुष्कर, कष्टकारी, आत्मघाती हड़ताल महीनों चलाई और अंततोगत्वा मालिकों के आगे घुटने टेक दिए और उनकी पुरानी शर्तों मान ली या ऐसी शर्तें मंजूर कर लीं जो पहले से भी बदतर थीं।
श्रीमन, मेरी समझ में, भारत रक्षा अधिनियम की धारा 81 में समाहित उपबंध सरकार को अनिवार्य पंच-फैसले का अधिकार देते हैं जो श्रमिकों के लिए बहुत लाभकारी बात है।
जहां तक मैं जानता हूं, जब से यह व्यवस्था लागू हुई है तब से अब तक बहुत कम ऐसे मामले हैं श्रमिक वह चीज न पा सके हों जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया। मेरी जानकारी के अनुसार अब तक जब ऐसी बहुत कम हड़तालें हुई हैं जिनका अंत श्रमिकों के पक्ष में न हुआ हो। श्री जोशी ने शिकायत की है कि धारा 81 को हमने हर मामले में लागू नहीं किया। जहां तक मैं समझ सका हूं, उनका आशय यह है कि सरकार ने श्रमिकों द्वारा उठाए गए हर विवाद में इस धारा को लागू नहीं किया।
इस मुद्दे पर मेरी गहरी सहानुभूति है, परंतु श्री जोशी की आपत्ति को स्वीकार नहीं किया जा सकता। श्री जोशी की बात इस शर्त के साथ स्वीकार नहीं की जा सकती कि जब भी कोई मजदूर संघ हड़ताल पर जाने की घोषणा करे और मालिक उनकी शिकायतें हल न करे, तो इस नियम को लागू कर दिया जाएगा।
एक माननीय सदस्यः भारत में इस अधिकार को स्वीकार क्यों नहीं किया जा रहा जबकि अन्य देशों में यह लागू है?