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नई दिल्ली में मस्जिदों का संरक्षण

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सकता। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं उन जजबात की कद्र नहीं करता जो संकल्प प्रस्तुत करते समय मेरे माननीय मित्र ने प्रकट किए हैं, परंतु प्रस्ताव को स्वीकार करने में अंतर्ग्रस्त कठिनाइयां हैं।

संकल्प के पहले भाग को लें। मेरे माननीय मित्र सर यामीन खान ने कहा है कि सरकार ने एक माननीय सदस्य को जो मुस्लिम हैं पहले ही एक मकान अलाट कर दिया है या आरक्षित कर दिया है। मैं समझता हूं कि उन्होंने अपने इस तर्क पर बल देने के लिए यह कहा है कि इस सिद्धांत को पहले ही स्वीकृत कर लिया गया है। मान्यवर, मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि यह गलत है। किसी माननीय सदस्य क लिए आवास आरक्षित नहीं किया गया है। यह एक संयोग की ही बात है कि यह मकान एक मुस्लिम सदस्य के कब्जे में है। परंतु मुझे इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि यदि यह मकान खाली होता है, जिसकी उम्मीद बहुत कम है, तो वरिष्ठतम सदस्य को अलाट किया जाएगा चाहे वह मुस्लिम हो अथवा गैर-मुस्लिम।

सर मोहम्मद यामीन खानः परन्तु एक पर्दा-दीवार भी बनाई गई है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह अलग बात है। मैं सिद्धांत की बात कर रहा हूं कि मौजूदा समय में सरकार के लिए ऐसे संकुचित सिद्धान्त को स्वीकार करना असम्भव है।

मान्यवर, सिद्धान्त को स्वीकार करने का क्या अर्थ है? इसमें दो बातें हैं। इसका अर्थ है कि सरकार यह आश्वासन दे कि सरकार उन गैर-मुस्लिमों को नोटिस दे जिनका उन मकानों पर कब्जा है जो इस संकल्प के अधीन आते हैं, और उन्हें

खाली करा लें। यदि सरकार इस संकल्प को स्वीकार कर लेती है तो इसके यही परिणाम निकलेंगे।

इस संकल्प को स्वीकार करने का दूसरा नतीजा यह होगा। मान लीजिए कोई बंगला खाली होता है और बारी से उसका आबंटन किसी ऐसे गैर-मुस्लिम को किया जाना है जिसे सरकार ने बाहर से दिल्ली बुलाया है और जिसकी उपस्थिति नितांत आवश्यक है, तो सरकार उसे वह आवास अलाट नहीं कर सकती। श्रीमन्, मेरा विनम्र निवेदन है कि मौजूदा हालात में यह एक असंभव शर्त है जबकि आवासों की अत्यधिक कमी है और जिन अधिकारियों को यहां बुलाया जाता है उन्हें हटमेंट्स में ठहराया जाता है या किसी भी प्रकार की अन्य छोटी-मोटी जगहें उन्हें दी जाती हैं। इस तरह का नियम स्वीकार कर लेने से वही ‘न-खाये-न-खाने दें’ वाली बात हो जाएगी। मेरे माननीय मित्र इस बात को समझें कि मौजूदा हालत में सरकार इसे स्वीकार नहीं कर सकती।