28. नई दिल्ली में मस्जिदों का संरक्षण - Page 177

152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं संकल्प के दूसरे भाग पर आता हूं जिसमें वहां रहने वालों पर सरकार से कुछ पाबंदियां लगाने के लिए कहा गया है। मुझे यह कहते हुए अफसोस है कि इससे बहुत कठिनाइयां उत्पन्न हो जाएंगी। श्रीमन्, यह सर्वविदित है कि कोई भी मालिक मकान किराएदार पर कुछ पाबंदियां लगता है। परंतु मुझे कोई शक नहीं कि माननीय मित्र सर यामीन खान इस बात से सहमत होंगे कि मालिक मकान किसी किराएदार पर ऐसी पाबंदी लगाएगा जिसका मकसद परिसर के संरक्षण से है। मैंने इसके बारे में विस्तार से नहीं देखा है, परंतु इस तरह की पाबंदी जो मेरे माननीय मित्र किराएदार पर चाहते हैं न्यायसंगत नहीं है क्योंकि इसका ताल्तुक परिसर के परिरक्षण से नहीं है।

अब मैं दूसरी कठिनाई पर आता हूं कि इस तरह के नियमों से किराएदार की क्या हालत होगी। श्रीमन्, मुझे संदेह नहीं, और मैं आश्वस्त हूं कि मैं इसे बढ़ा-चढ़ा कर नहीं कह रहा हूं कि संकल्प में की गई व्यवस्था को यदि मैं लागू कर दूं, और वहां रहने वाला चाहे वह मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम, अपने परिसर को नमाज़ के लिए हर आम-खास के लिए खुला छोड़ दें, तो इससे उसका एकांत समाप्त हो जाएगा और उसका घर मुसाफिरखाना बन जाएगा। मुझे इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी गैर-मुस्लिम किराएदार के लिए यह बहुत मुश्किल होगा और ऐसी ही पाबंदियां यूरोपियनों पर भी लगानी होंगी। परंतु मैं यह कहने का भी साहस रखता हूं कि कोई मस्लिम किराएदार भी उन पाबंदियों को मंजूर नहीं कर सकता जो मेरे माननीय मित्र लगाना चाहते हैं। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि मेरे माननीय साथी जो प्रस्ताव में वर्णित जैसे घर मेंं रह रहे हैं वह अपनी सभी धार्मिक आस्थाओं के बावजूद नजाज के नाम पर अपने घर में भीड़ को नहीं घुसने देंगे।

श्रीमन, मुझे खेद है कि जो कारण मैंने बताएं हैं कि उनके आधार पर मेरे माननीय मित्र इससे सहमत होंगे कि ये कोई अस्थायी कारण नहीं हैं। मैं इस संकल्प को स्वीकार करने में असमर्थ हूं।