डॉ. बी. आर. अम्बेडकर-जीवन-झाँकी - Page 20

डा. बी. आर. अम्बेडकर जीवन-झॉकी 17

दोनों रूढि़वादी ब्राह्मण वंशज थे और पत्नी में अभी भी जातीयता की भावना भरी थी, अतः उन्होंने बंबई वापस आने का निर्णय लिया।

वहां जाकर वे सिडेन्हम कॉमर्स कालेज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बन गए। किन्तु उन्होंने इंग्लैंड जाकर अपनी शिक्षा पूर्ण करने का निश्चय किया। उन्होंने प्राइवेट ट्यूशन करके अपनी आय में वृद्धि की। एक-एक पाई बचाई और एक या दो साल बाद लंदन स्कूल आफ इकनामिक्स में पुनः प्रवेश लिया। उन्हें ‘प्राबलम आफ द रूपी’ (रुपए की समस्या) पर लंदन में लिखे गए शोध-पत्र पर डी.एस.सी. की उपाधि मिली और एक बैरिस्टर के रूप में मान्यता दी गई। उनकी इच्छा जर्मनी के किसी विश्वविद्यालय में अध्ययन करने की थी जो उन्हें बोन ले गई, किन्तु विनिमय दर में गिरावट के कारण उन्हेंं बिना उपाधि के ही भारत वापस आना पड़ा। अब उन्होंने सरकार में या विश्वविद्यालय में नौकरी करने की बजाए वकालत करने का निर्णय लिया जिससे कि वे पूर्णतः स्वतंत्र रह कर अछूतों के लिए काम कर सकें।

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दलित वर्गों से निकट संपर्क

उनके मन का यह भय कि सवर्ण हिंदू अधिवक्ता और वकील जिन पर वह कानूनी हिदायतों के लिए निर्भर हों, भेदभाव बरतेंगे और उनकी वकालत में बाधा पहुंचेगी, निराधार निकाला और उन्होंने बंबई में दीवानी के अच्छे वकील के रूप में स्थान बना लिया। बंबई और नागपुर विश्वविद्यालय तथा बंबई उच्च न्यायालय ने इन्हें विधि विषय का परीक्षक बनाया और कुछ समय तक वह राजकीय विधि महाविद्यालय, बंबई में आचार्य एवं प्रधानाचार्य के पद पर भी रहे। उन्होंने समय-समय पर न्यायिक पदों पर नियुक्ति के लिए रखे गए प्रस्तावों को इस लिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसके कारण उन्हें राजनीतिक जीवन से अलग होना पड़ेगा।

दस वर्ष तक यह अछूत बैरिस्टर एवं प्रोफेसर परेल में बंबई विकास विभाग की एक चाल में रहा। यह चालें पांच मंजिला विशाल भवन थे जिनमें प्रत्येक में एक कमरे वाले लगभग एक सौ आवास थे। उनमें कोई भी आधुनिक सुविधाएं नहीं थी, प्रत्येक मंजिल पर केवल एक शौचालय था और नहाने-धोने तथा बर्तन साफ करने के लिए केवल एक नल था। वहां रहने वाले अधिकांश लोग मिलों में काम करते थे जिनकी आय औसतन 25 रुपए प्रति मास होती थी।

इन्हीं स्थितियों मेंं रहते हुए डॉ. अम्बेडकर को बंबई के कामगारों के जीवन का प्राथमिक परिचय मिला। यह उनके लिए बड़ा सहारा था कि उन्हें सैंकड़ों कामगार व्यक्तिगत रूप से जानते थे और उनकी सलाह और सहायता लेते थे। इस रूप में