176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कि श्रम सम्मेलन के सभापति को किस प्रकार का उद्घाटन भाषण देना चाहिए। इस अधिवेशन में आपके सामने व्यावहारिक महत्व के विषयों पर बोल कर मैं इस कठिनाई से पार पा सकता हूं। मुझे विश्वास है कि यह आपको असंगत नहीं लगेगा।’’
मैं दो विशिष्ट मामलोंं पर बोलना चाहता हूं जिसमें सम्मेलन के सदस्यों की रुचि हो सकती है। पहले तो मैं उन मामलों पर बोलूंगा जिन पर सम्मेलन और स्थायी श्रम समिति में चर्चा हो चुकी है और यह बताऊंगा कि विभिन्न मामलों में सरकार ने क्या कदम उठाए हैं। दूसरे, मैं त्रिपक्षीय सम्मेलन के गठन और प्रक्रिया के दोषों पर प्रकाश डालूंगा।
‘‘पहला विषय इतना विस्तृत है कि इस भाषण में उस पर विचार व्यक्त करने में काफी समय लग सकता है। आपकी कार्यसूची को देखते हुए मैं इसमें आपका समय
खराब नहीं करना चाहता। इसलिए मैं इस विषय में आपको अलग से एक ज्ञापन दे रहा हूं जो इस भाषण के साथ संलग्न है। इसे मेरे संबोधन का अंग समझा जाए।’’
त्रिपक्षीय संगठन
अब मेरे बोलने के लिए बचता है इस सम्मेलन के संगठन और प्रक्रिया का विषय। स्थायी श्रम समिति और पूर्ण सम्मेलन का हमें दो वर्ष का अनुभव है। यह लंबा नहीं कहा जा सकता। पर थोड़ा होते हुए भी इसने हमारे संगठन की कुछ कमजोरियों को उजागर किया है। इनमें से निम्नांकित मुझे गंभीर लगती हैंः-
- सम्मेलन और स्थायी श्रम समिति के कार्यों के मध्य कोई स्पष्ट विभाजन
नहीं है। बात यह नहीं है कि एक परामर्शदात्री संस्था है और दूसरी कार्यकारी
है। दोनों परामर्शदात्री हैं।
- एक से ही कार्य दोनों के लिए निर्धारित हैं। दोनों एक से ही विषयों पर
विचार करती हैं।
- सम्मेलन और समिति ने सामान्य ढंग से प्रश्नों और ठोस समस्याओं का अंतर
नहीं समझा जाता है। सम्मेलन और समिति में विचार-विमर्श इतना सामान्य
प्रकार का होता है कि उससे कोई विशेष लाभ नहीं हो सकता, यहां तक
कि ठोस समस्याओं को भी सामान्य दृष्टि से देखा जाता है।
- विशेष कार्यों को निपटाने के लिए कोई तंत्र नहीं है, न ही उनके बारे में
सूचना देने की व्यवस्था है। यह एक महत्वपूर्ण कार्य है और इसे सरअंजाम
देने के लिए कोई तंत्र होना चाहिए।
- उद्योगवार श्रम कल्याण की समस्याओं पर सलाह देने के लिए कोई तंत्र होना
चाहिए।