कारखाना (दूसरा संशोधन) विधेयक
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ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः इस तथ्य की दृष्टि से कि विधेयक के संबंध में मैंने जो प्रस्ताव रखा है उस पर आम सहमति है, मेरा काम बहुत आसान हो गया है और इसलिए मैं चर्चा का उत्तर बहुत संक्षिप्त रखूंगा।
मैं अपने माननीय मित्र डॉ. जिआउद्दीन अहमद के भाषण के विषय में कुछ बातें साफ कहूंगा। और मैं यह कहना चाहता हूं कि जो कुछ उन्होंने कहा है उस पर मुझे कुछ नहीं कहना है और मुझे आशा है कि यदि मैं यह कहूं कि बहस के दौरान जो कुछ उन्होंने कहा उसका विधेयक से कुछ लेना-देना नहीं है तो इसे उनके प्रति अभ्रदता न समझा जाए। उन्होंने श्रम समस्या के समाधान के लिए एक नया सिद्धांत प्रतिपादित किया है जिसे उन्होंने भागीदारी का नाम दिया। मेरा विचार है कि अपने सिद्धांत पर उन्होंने जो प्रकाश डाला है उससे हमें बहुत लाभ होगा और मैं उन्हें आश्वस्त कर सकता हूं कि जब हमारे संविधान का स्वरूप हमारे सामने आएगा तो उनका कथन बहुत लाभदायक सिद्ध होगा और मुझे ही नहीं उन लोगों को भी लाभ होगा जो उस समस्या से संबद्ध होंगे।
अब मैं दूसरे वक्ताओं पर आता हूं। पहले मैं अपने मित्र सर विट्ठल चन्दावरकर के विचारों पर बोलना चाहूंगा। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के सवेतन अवकाश संबंधी प्रस्ताव का संदर्भ दिया है जो सर फ्रेंक नोयेस ने सदन में पेश किया था। मैं उस मुद्दे को ठीक से समझ नहीं पाया जिसका उन्होंने अपने भाषण में जिक्र किया, परंतु मैं यह समझ सका हूं कि उनका तात्पर्य यह था कि भारत सरकार ने अपनी नीति बदल दी है।
सर विट्ठल एम. चन्दावरकरः नहीं, नहीं।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः उनका कहना था कि 1936 में सरकार इसके विरुद्ध थी जबकि अब वह सम्मेलन की बातें को मान रही है। मैं नहीं समझता कि भारत सरकार की स्थिति में कोई परिवर्तन हुआ है। मैंने बहस को ध्यान से पढ़ा है और मुझे पूरा विश्वास है कि उस समय की सरकार द्वारा विरोध का जो कारण था वह यह था कि उस समय यह राय बनी कि यदि किसी अभिसमय के सिद्धांतों को मान्यता देनी है तो वह संपूर्ण मान्यता होनी चाहिए। इसे आंशिक मान्यता नहीं दी गई, और भारत सरकार को उस समय जो सलाह मिली तब इस देश की परिस्थितियां ऐसी थीं कि अभिसमय की बातों को संपूर्ण रूप में स्वीकार करना असंभव था और यद्यपि वह इस सिद्धांत को स्वीकार करने के लिए तैयार थी और कुछ सीमित क्षेत्रों में लागू करने की संभावना खोजने को भी तैयार थी, सिवा उसके कुछ नहीं कर सकी जो तत्कालीन परिस्थितियों में उसके लिए व्यावहारिक था।
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 4, 7 नवम्बर, 1944 पृष्ठ 372-75